दिल्ली-अंबाला रेलमार्ग पर बाबरपुर और कोहंड के बीच पड़ने वाले कच्चे फाटक के गेट नंबर-59 व 60 पर तैनात गेटमैनों को डर के साए में रेल व मालगाड़ियों को सिग्नल देना पड़ रहा है।
गेटमैन कमरे से बाहर तो शायद सुरक्षित रहें, लेकिन यहां पर बनाए गए कमरों में घुसने पर उनकी जान पर बन आती है। कारण दोनों ही फाटकों पर बनाए गए कमरों की बहुत खस्ता हो जाना है।
दरवाजों और खिड़कियाें पर जाली न होने के कारण कमरों में आए दिन जहरीले जीव मिल रहे हैं। बारिश के दिनों में तो स्थिति और भी ज्यादा बिगड़ जाएगी।
इस रेलवे कर्मचारियों की मानें तो वे कई बार कमरों की स्थिति को सुधारवाने के लिए संबंधित अधिकारियों से बात कर चुके हैं, लेकिन अभी तक समाधान नहीं हो पाया है।
गेट और खिड़की जाली लगाने की मांग
मुख्य रेल मार्ग पर स्थापित दोनों ही गेट सुनसान क्षेत्र में है। भवन की हालत खस्त हो चली है। यहां पर तैनात कचारियों ने बताया कि जब वे अपनी शिफ्ट के अनुसार रात को आते हैं तो उन्हें कई बार जहरीले जीव मिल चुके हैं।
एक कर्मचारी ने बताया कि उसे तो कई दिन पहले सांप ने ही काट लिया होता, सौभाग्य से वे बाल-बाल बच गए। उनका कहना है कि मुख्य दरवाजे पर जाली वाला गेट व खिड़कियोें में भी जाली लगे तो कुछ बात बने।
कैसे करेंगे नियमों का पालन
किसी भी फाटक पर रेलगाड़ी या मालगाड़ी को सुरक्षित क्रास कराना गेटमैन की जिम्मेदारी होती है। उसकी थोड़ी भी लापरवाही से कोई भी बड़ी अनहोनी घटने की आशंका बढ़ जाती है।
कच्चे फाटकों को समय पर गेट को बंद करना, ट्रेन को हरी झंडी दिखाना आदि बातों को विशेष तौर पर गेटमैन को ही ध्यान देना होता है, लेकिन डरे सहमे गेटमैन सुरक्षा व इस तरह के नियमों का कैसे ध्यान दें?