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...मां की चप्पल टूट गई, और बाबू का चश्मा

Mon, 28 Sep 2015 12:48 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला पानीपत
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अंकन साहित्यिक मंच की काव्य गोष्ठी में कविताओं के माध्यम से देश की व्यवस्था पर व्यंग्य किया और वर्तमान में मां-बाप के प्रति बच्चों की सोच पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता रमेश चंद्र पुहाल ने की। मुख्य अतिथि तौकीर सीतापुरी और विशिष्ट अतिथि ओम दत्त आर्य रहे। मंच संचालक सिराज पैकर ने किया।
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कमलेश कुमार पालीवाल ने कहा कि आदमी है, आदमी से प्यार करना सीख लें। मौत लाजिम है समझ ले, ये तो टल सकती नहीं, हो निडर तू मौत का सत्कार करना सीख लें।। अजय जोशी ने कहा कि मंदिर मस्जिद का ही मुद्दा होता हर बार यहां, चाहे जिसकी भी होती है सत्ता में सरकार यहां। पतझड़ से क्या शिकवा करना गुलशन की बर्बादी का, माली के हाथों ही उजड़ा है गुलशन हर बार यहां।।
अमर सिंह मितोलिया ने कहा कि किसको कहें हम अपना, यहां कौन हमारा है, पैसे की ये दुनिया सारी, पैसा सबको प्यारा है।।
केसर कमल शर्मा ने कहा कि सुनो मानवता के हत्यारे, अब तो अपनी सोच सुधारों बेटी ही वंश बढ़ाती है, बेटी को कोख में मत मारो।। सुलेख जैन  कहा कि छोटे से छोटे प्राणी पर भी दया करो, वह भी काम आ जाता है, अगर सूर्य छिप जाए तो दीपक ही काम आता है।। ओमदत्त आर्य ने कहा कि राम-रावण युद्ध हुआ केवल एक लकीर के पीछे, महाभारत का युद्ध हुआ केवल एक चीर के पीछे। होकर रहेगा एक और महाभारत केवल इस कश्मीर के पीछे।।
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अश्वनी कुमार सांवरिया ने कहा कि मेरे हमसफर मेरे साथ चल जहां मिल रहे धरती गगन, ना गर्दिशें ना खार है, बहार ही बहार है। जहां प्यार का महके चमन, जहां मिल रहे धरती गगन।। रमेश चंद्र पुहाल पानीपती ने कहा कि चांदनी रात सितारों का जहां याद आया, मैं तो सब भूल चुका था ये कहां याद आया। जिसकी खुशबू से महकते थे मेरे शामोसहर, दफ्अतन आज वहीं दुश्मने जां याद आया। गर्द की तह में दबे होंगे बुजुर्गों के निशां, हम से जो छूट गया वो मकां याद आया।।
सिराज पैकर ने कहा कि खुदी में चूर होता जा रहा है, खुदा से दूर होता जा रहा है। जरा सी तारीफ तेरी क्या कर दी, बहुत मगरूर होता जा रहा है।। धर्मेंद्र अरोड़ा मुसाफिर ने कहा कि खुशियां पर छा ही जाते है अक्सर गम के बादल, इतना समझ ऐ दिल नादां, दौर कोई ठहरता नहीं।।
अजीत दीवाना ने कहा कि मां की चप्पल टूट गई, और बाबू का चश्मा टूटा। मां ने खाना खाया है या बाप अभी तक है भूखा। कोई भी सुध लेता नहीं किससे अपनी व्यथा कहें। बच्चे बे परवाह हो गए, जैसे आपस का नाता टूटा।।
सुभाष भाटिया ने कहा कि शैतान को मत मारो, ये भी खुदा का पैगंबर है, हम सब में इंसानियत जगाने के लिए। हम फिर भी ना जागे, भटकते रहे दुनिया में, हम शैतान से भी बड़े हो गए, शैतानी फैलाने के लिए।। निर्मल आर्य ने कहा कि दूर है तू अब नजर से फिर भी मेरे पास, जिदंगी भर की दुआ है, स्वात्मा ही आस है। जब पकड़ कर हाथ तूने मां कहा पहली दफा, उंगलियों को उस छुवन का आज तक अहसास है।। कृष्ण लाल सोनी ने कहा कि मेरा यौवन यू खोया है, तीखे कांटो पर सोया है। इन नैनों की गंगा यमुना में मैनें अक्सर मुंह धोया है।। राजेंद चुघ ने कहा कि आज यहीं है निशानी नौ जवान की, हाल ढीला और चाल पहलवानी की। नरेश लाभ ने आशा की किरणों को लेकर नव विहान जब होता है, सोने के पानी से आंखों को सूरज ही तो धोता है।।
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