तुर्की और चीन के कारपेट को टक्कर देते हुए टेक्सटाइल के बाद अब कारपेट उद्योग में भी पानीपत की चमक दिखने लगी है। पानीपत का कारपेट उद्योग इस साल छह हजार करोड़ तक पहुंच गया है, पिछले पांच साल मेें इसमें डेढ़ हजार करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। इतना ही नहीं कारपेट से जुड़े 40 नए उद्योग भी बीते पांच साल के दौरान स्थापित किए गए हैं। पानीपत का कारपेट यूरोप, आस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका और अरब के देशों के लोगों की पसंद बन चुका है। यहां पर सबसे ज्यादा कारपेट एक्सपोर्ट किया जा रहा है। जो हाल के वर्षों में बढ़ा है। उद्यमियों का मानना है कि सरकार थोड़ा सहयोग करे तो वे कारपेट कारोबार में हरदोई को पीछे छोड़ देंगे।
पानीपत का कारपेट हैंडमेड है, जिसकी वजह से इसकी कीमत ज्यादा है। जबकि तुर्की और चीन में बना कारपेट मशीन से बनाया जाता है। मशीन से बना कारपेट सस्ता है, इसलिए उसकी मांग अधिक है।
- बेल्जियम और जर्मनी से मशीनों को आयात करने में मिले सहयोग
तुर्की का कारपेट मार्केट में आने से पहले भारतीय कारपेट कारोबार को मात्र चीन से ही चुनौती मिलती थी। अब तुर्की में मशीन से बन रहे सस्ते कारपेट चुनौती बन रहा है। यहां बेल्जियम और जर्मनी की बनी मशीनों से कारपेट तैयार किया जा रहा है। इससे कम समय पर अधिक उत्पादन होता है। मशीन से कारपेट पर कम समय में विभिन्न प्रकार के डिजाइन प्रोसेस होते हैं। भारत में हाथ से कारपेट बनाने में तीन से चार दिन लगते हैं। जबकि मशीन से एक दिन में कई हजार मीटर कारपेट तैयार होता है। ऐसे में बेल्जियम और जर्मनी की मशीनों को आयात करने में सहयोग मिलना चाहिए।
पानीपत से निर्यात बढ़ा, ढाई हजार करोड़ तक पहुंचा
पानीपत से इस वक्त ढाई हजार करोड़ से अधिक का कारपेट निर्यात हो रहा है। यहां पर 150 उद्योग लगे हुए हैं। मशीनी कारपेट 30 से 40 रुपये प्रति फुट पड़ता है। जबकि हाथों से बना कारपेट 125 रुपये फुट पड़ता है। इसलिए भारत का कारपेट तुर्की व चीन से तीन गुना महंगा पड़ता है। पानीपत के 90 प्रतिशत उद्योगों में हाथ से कारपेट बनते हैं।
सरकार इंस्टीट्यूट खोले तो कारपेट हब बन सकता है पानीपत
सरकार से मांग है कि पानीपत में भी कारपेट स्किल को विकसित करने के लिए इंस्टीट्यूट खोला जाए, ताकि उन्हें ट्रेंड लेबर मिल सके। अब पानीपत का कारपेट कारोबार छह हजार करोड़ का हो गया है। 250 उद्योग कारपेट के चल रहे हैं। स्किल्ड वर्कर मिलेंगे तो पानीपत को कारपेट हब बनाया जा सकता है।
अनिल मित्तल, प्रधान कारपेट एसोसिएशन, पानीपत।