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Panipat News: एक चौथाई आबादी अस्थमा पीड़ित, फेफड़ों की जांच के लिए स्पाईरोमेेेट्री मशीन नहीं

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पानीपत। जिले की एक चौथाई आबादी अस्थमा से पीड़ित है। जिला नागरिक अस्पताल में हर रोज अस्थमा के 30-35 नए मरीज आते हैं। इनमें बुजुर्गाें की संख्या अधिक है। धूम्रपान करने वाले लोग अस्थमा से अधिक पीड़ित हैं। औद्योगिक नगरी होने व यातायात दवाब अधिक होने के कारण वातावरण में रसायन युक्त धुंआ मिश्रित रहता है। कंबल, चादर, कारपेट निर्माण के चलते इनके रेशे भी वातावरण में तैरते हैं। जगह-जगह कंस्ट्रक्शन कंपनियों का निर्माण कार्य भी चलता रहता है। इसलिए लाखों लोग अस्थमा से ग्रस्त हो चुके हैं लेकिन स्वास्थ्य विभाग के पास फेफड़ों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए स्पाईरोमैट्री मशीन नहीं है। इसके लिए डॉक्टरों को एक्स रे का ही सहारा लेना पड़ता है।
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स्वास्थ विभाग की इमरजेंसी मेडिसिन डॉ. सुखदीप कौर ने बताया कि एलर्जी ज्यादातर बच्चों, किशोरों और महिलाओं को होती है। इसका इलाज अस्तपाल में संभव है। शुद्ध रूप से अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों को रेफर करना चिकित्सकों की विवशता है। अस्थमा जेनेटिक भी हो सकता है और धुम्रपान व प्रदूषित वातावरण से भी दमा के रोगी हो सकते हैं। हर दसवां बच्चा अस्थमा जैसे लक्षणों से प्रभावित है। बेहतर होगा कि बच्चों को ठंडी खाद्य सामग्री खाने को न दें। धूल, धुआं, पालतू पशुओं व जानवरों से बचाएं। बीडी-सिगरेट पीते समय ध्यान रखें कि धुआं बच्चे को प्रभावित न करें। बीमारी के लक्षण दिखने पर तुरंत इलाज शुरू कराएं।

सबसे अधिक दमा के रोगी फैक्ट्ररियों में काम करने वाले श्रमिक हैं। यह रुई, कंबल, डाइंग व धागा के मिलों में बिना मुंह ढके काम करते हैं। सांस के जरिए इनके शरीर में कपड़े का रुआ जाता है। जो दमा का कारण बनता है। फैक्ट्ररियों में काम करने वाला हर पांचवां श्रमिक दमा रोगी है।
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अस्थमा से बचाव :



-मच्छर भगाने के लिए क्वायल नहीं जलाएं।



-घर में पालतू कुत्ता-बिल्ली के संपर्क में न रहें।



-जिस चीज को खाने से एलर्जी होती है उसे न खाएं।



-धूल, धुआं और धूम्रपान से परहेज करें।



-घरों में बिछे कारपेट सावधानी से साफ करें।
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