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निरंकारी समागम : महाराष्ट्र से आए 700 सेवादारों ने संभाली लंगर हॉल की कमान, सेवा भाव बनी मिसाल

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अमन शर्मा
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पानीपत। समालखा में आयोजित निरंकारी समागम में इस बार निस्वार्थ सेवा भाव की एक अनूठी और प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिली। महाराष्ट्र से आए 700 सेवादारों के एक दल ने समागम परिसर के 10 ब्लॉक में स्थित लंगर हॉल का पूरा मोर्चा संभाले रखा। सुबह आठ बजे से रात 12 बजे तक लगातार यह सेवादार आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को सुचारु रूप से भोजन कराने की सेवा में समर्पित हैं।
लंगर हॉल में महाराष्ट्र का यह दल पूरी निष्ठा, अनुशासन और श्रद्धा के साथ व्यवस्थाएं संभाले हुए है। दल के सदस्य अलग-अलग जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कोई सब्जियां काटने की सेवा में लगे हैं, तो कोई गर्म दाल-रोटी परोस रहा है। वहीं कुछ सेवादार श्रद्धालुओं के बैठने, पीने के पानी और प्रसाद वितरण की व्यवस्था देख रहे हैं। समागम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बावजूद लंगर हॉल में किसी प्रकार की अव्यवस्था देखने को नहीं मिल रही है। कतारबद्ध तरीके से श्रद्धालु भोजन ग्रहण कर रहे हैं और सेवादार चेहरे पर मुस्कान सजाए उनका सत्कार कर रहे हैं।
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पद और प्रतिष्ठा भूल निस्वार्थ सेवा
इस महाराष्ट्र दल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शामिल कई सदस्य अपने राज्य में जिला कोर्ट में महिला अधिवक्ता, प्रशासनिक अफसर और विभिन्न बड़े पदों पर कार्यरत हैं। समागम में पहुंचते ही वे अपने पद, प्रतिष्ठा और सहूलियतों को भूलकर एक साधारण सेवादार की भांति कार्य कर रहे हैं। यहां न कोई वीआईपी है और न ही कोई बड़ा-छोटा, सभी एक समान भाव से सेवा में लगे हुए हैं। यही कारण है कि समागम में पहुंचे श्रद्धालु इन सेवादारों के समर्पण और विनम्रता की खुलकर तारीफ कर रहे हैं।
33 वर्षों से निरंतर जारी है सेवा की यह यात्रा
मैं पीडब्ल्यूडी में चालक के पद पर तैनात हूं और 1993 से निरंकारी समागम से जुड़ा हुआ हूं। परिवार के साथ 21 अक्तूबर को समागम में आया था और 28 अक्तूबर तक लंगर सेवा में जारी रहेगी। यहां सेवा करने से जो आत्मिक शांति और आनंद मिलता है, उसकी तुलना किसी भौतिक सुख से नहीं की जा सकती।
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शिवाजी महाले, सेवादार (महाराष्ट्र)
संस्कार बन चुकी है समागम में सेवा करने की परंपरा
मैं एमटीएनएल कंपनी में कार्यरत हूं। हमारे परिवार के सदस्य देश के किसी भी हिस्से में होने वाले निरंकारी समागम में अपनी भागीदारी अवश्य सुनिश्चित करते हैं। वर्ष 2000 से समागम में आ रहा हूं। हर साल सेवा में योगदान देना अब परिवार की एक अटूट परंपरा बन चुका है और बच्चे भी इसी सेवा भाव के संस्कारों के साथ बड़े हो रहे हैं।
बाल चंद्र यादव, सेवादार (महाराष्ट्र)
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