इसराना। नौल्था में 982 वर्ष पुराना फाग उत्सव के लिए नई पीढ़ी में जोश कम होता जा रहा है। बुर्जुग बताते है कि यहां फाग उत्सव मनाने के लिए दो सप्ताह पूर्व तैयारियां शुरू हो जाती थी।
अब मात्र तीन ही दिन बचे है, गांव में सूखी डाट तो लगनी शुरू हुई है लेकिन अब पहले जैसा जोश नजर नहीं आ रहा। कभी माना जाता था कि ब्रज की होली, कुल्लू का दशहरा और नौल्था का फाग जिसने नहीं देखा उसने जिंदगी में कुछ नहीं देखा।
ग्रामीण ओमप्रकाश ने बताया कि गांव में फाग उत्सव का शुभारंभ फाग से दो सप्ताह पूर्व गांव की चौपालों के पास सूखी डाट लगाने से होता था। गांव में किसी प्रसिद्ध सांगी का सांग भी बुलाया जाता था। जो ऐतिहासिक, धार्मिक और देशभक्ति पर आधारित किस्सों का मंचन कर लोगो का मनोरजंन करते थे।
फाग के दिन बाबा लाठे वाले व देवी देवताओं की झांकियां निकाली जाती थी। इसके बाद गांव की सभी चौपालों पर कड़ाहाें में रंग उबाल कर रंगाें की डाट खेली जाती थी। लेकिन कई सालाें से परिवारों और लोगों के सिमटते दायरों से परंपरा को कायम रख पाना मुश्किल लग रहा है। जो आपसी सद्भाव पहले हुआ करता था अब नही रहा। वह चाहते है कि सदियाें से चली आ रही परंपरा कायम रहे।
एक समय था कि जब गांव के घुम्मन जैलदार के बेटे सरदारा की फाग के दिन मौत हो गई। पूरे गांव में मातम छा गया था। फाग उत्सव को रोक दिया था। वर्षों से चली आ रही परंपरा न टूटे इस के लिए घुम्मन जैलदार ने कहा कि फाग उत्सव जरूर मनेगा।
बाद में बेटे का दाह सस्ंकार किया जाएगा। जैलदार ने रंग से पिचकारी भर बेटे की अर्थी पर मारी ग्रामीण चंद्रसिंह जागलान ने बताया कि फाग से दो सप्ताह पूर्व गांव की चौपाल की दीवार के साथ दोनों तरफ ग्रामीण दोनों हाथ ऊपर उठा कर खड़े होकर जोर अजमाइश करते हैं। इसको सुखी डाट कहा जाता है। मगर अब पहले वाली बात कहां।
ग्रामीण हरीचंद कपूर का कहना है कि फाग उत्सव के मनाने की जिम्मेदारी युवाओं के कंधों पर होती है।
लेकिन मौजूदा हालात में परंपरा को समझने का किसी के पास समय नहीं है। युवाओं को अपनी परंपरा और संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए।
सरपंच ईश्वर जागलान का कहना है कि फाग उत्सव की तैयारियां पूरी की जा रही है। हर काम व उसकी तैयारियां तरीके से चल रही है। फाग उत्सव के सफल आयोजन के लिए युवाओं की कमेटियां बनाई जा रही है। फाग उत्सव की परंपरा को गत वर्षों की तरह मनाया जाएगा। परंपरा को कायम रख जाएगा।