पानीपत। पानीपत रेलवे स्टेशन मॉडर्न स्टेशनों में गिना जाता है। लेकिन, ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों को सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा। हालात इतने बदतर हैं कि रेल में सफर कर रहे यात्रियों की तबीयत खराब हो जाए तो उन्हें पानीपत रेलवे स्टेशन पर डॉक्टर की सुविधा तक नहीं मिल पाती। ऐसे में कई बार यात्रियों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है या फिर अपने स्तर पर अस्पताल जाना पड़ता है। इससे यात्रियों को ही नहीं, रेलवे अधिकारियों और कर्मचारियों को भी उठानी पड़ रही है।
पानीपत रेलवे स्टेशन से हर रोज करीब 150 से अधिक ट्रेन गुजरती हैं। इनमें 40 हजार से भी ज्यादा यात्री सफर करते है। दूसरी ओर रेलवे स्टेशन की एक दिन दी आमदनी लगभग 12 लाख से भी अधिक है। प्रतिमाह 36 लाख रुपये से अधिक के आमदनी वाले स्टेशन पर स्वास्थ्य सुविधाएं सिर्फ दिखावे के लिए ही है। ट्रेनों में सफर करने वाले यात्रियों में से किसी की भी तबीयत बिगड़ जाए तो स्टेशन पर बने अस्पताल में दवाइयों के अलावा कुछ नहीं दिया जा सकता।
रेलवे अस्पताल में तीन साल से नहीं डॉक्टर
पानीपत रेलवे स्टेशन स्थित रेलवे का अस्पताल करीब तीन साल से डॉक्टर को तरस रहा है। रेलवे स्टेशन पर कोई घायल हो जाए या फिर रेल में किसी की तबीयत खराब हो जाए। अस्पताल में डॉक्टर नहीं होने के कारण दोनों में से किसी को प्राथमिक उपचार तक नहीं मिल पाता। इस कारण रेलवे ट्रैक और प्लेटफार्म पर कोई हादसा होने के बाद अधिकतर यात्री अपनी जान गंवा बैठते हैं। डॉक्टर की मांग लिखित में भेजने के बाद भी रेलवे के उच्च अधिकारियों ने रेलवे स्टेशन पानीपत पर किसी भी डॉक्टर को नियुक्त नहीं किया है।
चीफ फार्मेसी के सहारे चल रहा अस्पताल
पानीपत जंक्शन का रेलवे अस्पताल एक चीफ फार्मेंसी के आधार पर चल रहा है। तीन साल पहले पानीपत स्टेशन के अस्पताल में सीएमपी डॉ. आरुषी अपनी सेवाएं दे रही थीं। लेकिन, उनका तबादला होने के बाद से पानीपत स्टेशन चीफ फार्मेसी अजय कुमार शर्मा, ओटी सहायक-2 मानिक डोंगरे, परिचालक कमलेश, संजना और सफाइकर्मी कमला देवी ही है। बता दें कि तीन साल पहले डॉ. आरुषी के जाने के बाद अस्पताल में लगे बोर्ड पर अब तक उनका ही नाम लिखा है।
चीफ फार्मेसी कई बार जाने से कर देते हैं इनकार
चीफ फार्मेसी कई बार आपातकालीन स्थिति में भी रेलवे स्टेशन पर आने से साफ मना कर देते हैं। इस कारण यात्रियों को बिना इलाज के सफर करना पड़ता है या फिर ट्रेन छोड़कर सिविल अस्पताल या किसी निजी अस्पताल में जाना पड़ता है। यदि अस्पताल में डॉक्टर होता तो वो स्टेशन से सूचना मिलने पर मौके पर जाकर मरीज को अटेंड कर सकते है। हाल ही में मंगलवार को एक यात्री की ट्रेन में सफर करने के दौरान हालात बिगड़ गई। स्टेशन से मेमो मिलने के बाद भी चीफ फार्मेसी ने आने से मना कर दिया। स्टेशन अधीक्षक धीरज कपूर ने यात्री को अटेंड किया था।
अस्पताल में करीब साढ़े चार हजार कर्मचारियों का रजिस्ट्रेशन
रेलवे अस्पताल में करीब साढ़े चार हजार कर्मचारियों का रजिस्ट्रेशन है। इनकी दवाइयां रेलवे के अस्पताल से जाती हैं। किसी भी रेलवे अधिकारी या कर्मचारी को दवाई लेने होती है तो वो रेलवे का कार्ड दिखाकर बिना पैसे के दवाई ले जाते हैं। पानीपत स्टेशन से स्टेशनों के कर्मचारी भी दवाई ले जाते हैं। चीफ फार्मेसी अजय कुमार ने बताया कि जो कर्मचारी रिटायर्ड हो गए हैं, वे भी अस्पताल से दवाई लेते हैं। रिटायर्ड कर्मचारी की दवाई करीब आठ हजार रुपये से अधिक की बन जाती है। यहां पर रिटायर्ड कर्मचारियों की संख्या 500 से अधिक है।
इमरजेंसी में भी नहीं मिल रहा उपचार
इमरजेंसी में भी घायलों और मरीजों को प्राथमिक उपचार नहीं मिल रहा। इससे मरीजों की स्थिति और बिगड़ जाती है। उन्हें सिर्फ रेफर करना पड़ता है। दूसरी ओर स्टेशन पर खड़ी एंबुलेंस भी किसी काम नहीं कर रही। मरीज या घायल को ले जाने के लिए आरपीएफ कर्मचारी या रेलवे अधिकारी 102 नंबर पर फोन कर सिविल अस्पताल से एंबुलेंस मंगवाते हैं।
ये हैं तीन मामले
25 जनवरी 2017 को रात करीब साढ़े आठ बजे दिल्ली निवासी सुभाष अग्रवाल की जन शताब्दी ट्रेन में हालात बिगड़ी। इसके बाद रेलवे अस्पताल में प्राथमिक उपचार न मिलने उन्हें निजी अस्पताल की एबुलेंस मंगवाकर शहर के निजी अस्पताल भेजा गया। वहां जाते वक्त उनकी मौत हो गई।
29 मार्च 2017 को शान ए पंजाब में पानीपत से एक परिवार चढ़ रहा था। अचानक से ट्रेन चलने पर पानीपत निवासी वेदप्रकाश और उसकी बेटी ट्रेन के नीचे आ गए। हादसे के बाद बेटी के हाथ की तीन अंगुलियां कट गई थी। बेटी को बचाने के चक्कर में पिता वेदप्रकाश गंभीर रूप से घायल हो गए थे। प्राथमिक उपचार न मिलने से उनकी मौत हो गई थी।
एक अप्रैल को पश्चिम एक्सप्रेस में सफर कर रहे एक यात्री सोहनलाल शर्मा की ट्रेन में हालात बिगड़ गई। उन्हें उल्टियां होने लगीं। इसके बाद उन्हें पानीपत स्टेशन पर उपचार के लिए उतारा गया। यहां पर प्राथमिक उपचार न मिलने कारण मौत हो गई।
डॉक्टर की नियुक्ति करना मेरे हाथ में नहीं है। यह कार्य हेड क्वार्टर का है। दूसरी ओर डॉक्टर की जगह चीफ फार्मेसी भी आपातकाल में मरीज और घायल का इलाज कर सकता है। यदि चीफ फार्मेसी ने स्टेशन पर आने से मना किया है तो इसकी जांचकर कार्रवाई की जाएगी।
विनय कुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, दिल्ली डिविजन।