पानीपत। भगवान जगन्नाथ की 127वीं रथयात्रा सोमवार को निकाली जाएगी। हालांकि कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण रथयात्रा पहली बार इलेक्ट्रॉनिक रथ से निकाले जाने की तैयारी है। 127 साल में ऐसा पहली बार होगा जब इलेक्ट्रॉनिक रथ पर भगवान जगन्नाथ विराजेंगे। इससे पहले रथयात्रा हर साल रथ पर ही निकाली गई है। अबकी एक जिप्सी को रथ का आकार दिया गया है।
रथयात्रा निकालने से पहले रविवार को सुबह 9 बजे स्वामी मुक्तानंद महाराज एवं सुधीर जिंदल ने गणेश पूजन व सर्व देवताओं का पूजन किया। तत्पश्चात स्वामी मुक्तानंद ने ध्वजारोहण किया। इसके बाद श्री सुंदरकांड का पाठ श्री सनातन धर्म संगठन द्वारा किया गया। सुंदरकांड का पाठ वेद शर्मा, डॉ. पुष्करणा, कृष्ण रेवड़ी, युधिष्ठिर शर्मा व रमेश सिंगला ने किया। शाम को 7 से 9 बजे हरिनाम संकीर्तन भगवानदास कंसल ने किया। नरेश सिंगला ने जोत प्रज्वलित की। इस अवसर पर प्रधान राजिंद्र गुप्ता, दिलीप गुप्ता, कन्हैया लाल गुप्ता, भूषण गुप्ता, हितेंद्र कंसल, दिनेश मित्तल, जयपाल कंसल, प्रदीप तायल, लालचंद तायल, नीरज कंसल, कमल कंसल, अशोक कैलाशी, सुबोध गुप्ता, योगेश गुप्ता, सुरिंदर गुप्ता, शशिकांत मित्तल आदि मौजूद रहे।
सुबह नौ बजे शुरू होगी रथयात्रा
प्रधान राजिंद्र गुप्ता ने बताया कि रथयात्रा से पहले सोमवार को सुबह 7 बजे पूजन होगा। सुबह 9 बजे स्वामी मुक्तानंद महाराज द्वारा यात्रा आरंभ की जाएगी। भगवान जगन्नाथ रथयात्रा मंदिर से चलकर देवी मंदिर तक जाएगी। वहीं, वापसी जगन्नाथ मंदिर में ही आकर समापन होगी। लगातार दूसरी बार यात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल नहीं होंगे। पिछली बार भी हाथों में भगवान जगन्नाथ की छोटी प्रतिमा रखकर देवी मंदिर तक ले गए थे।
यात्रा में सीमित संख्या में शामिल होंगे श्रद्धालु
इस बार यात्रा में सीमित संख्या में ही श्रद्धालु शामिल होंगे। प्रधान राजिंद्र गुप्ता ने बताया कि जगन्नाथ मंदिर समिति ने फैसला लिया है कि कोविड-19 को देखते हुए सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाएगा। रथयात्रा में मुश्किल से 50 लोग शामिल होंगे। हालांकि भक्तों के दर्शनों पर कोई रोक नहीं है लेकिन वे रथयात्रा के साथ नहीं चलेंगे।
शहर में 1894 में निकली थी पहली रथयात्रा
समिति प्रधान राजिंद्र गुप्ता ने बताया कि पानीपत शहर में पहली रथयात्रा 1894 में निकाली गई थी। शहर के लाला बलदेवदास गुप्ता कई सदस्यों के साथ 1890 में पुरी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने गए थे जहां वे यात्रा में शामिल हुए। उससे प्रेरित होकर ही उन्होंने 1894 में शहरवासियों के लिए पहली यात्रा जगन्नाथ मंदिर से देवी मंदिर तक शुरू की थी।