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Panipat News: पराली जली कम, शहर में प्रदूषण हो गया ज्यादा

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पानीपत। धरती पुत्र पराली जलाने के बजाय इसे पशुओं के चारे में प्रयोग करने के साथ इससे आय भी करने लगा है। नतीजतन पराली जलाने के मामले लगातार कम हो रहे हैं। पानीपत की ही बात करें तो इस साल अब तक जिले में 20 मामले सैटेलाइट में सामने आए हैं, जबकि पिछले साल 85 और 2021 में 252 मामले सामने आए थे। इन सबके बीच पानीपत में पर्यावरण प्रदूषण लगातार बिगड़ता जा रहा है। शनिवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 298 रहा। दिल्ली एनसीआर में होने के चलते पानीपत में ग्रैप तीन की शर्ते तक लागू कर दी गई हैं। कृषि विभाग ने इसे किसानों को जागरूकता और प्रदेश सरकार की पराली प्रबंधन को लेकर योजनाओं का नतीजा बताया है। अधिकारियों का दावा है कि अगले साल इन मामलों को जीरो किया जाएगा।
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जिले में 83 हजार हेक्टेयर में धान की फसल थी। अब तक धान कटाई का कार्य करीब 70 प्रतिशत तक हो चुका है। बड़ी संख्या में किसानों ने गेहूं की भी बिजाई कर दी है। कई पछेती किस्मों की कटाई किसान कर रहे हैं। यह अगले 15 दिन में पूरा हो सकता है। इस बार खास बात रही कि किसानों ने फसल अवशेष जलाने के बजाय खेतों में ही दबा दिया और पराली जलाने के बजाय इसे पशुओं के चारे में प्रयोग करना शुरू कर दिया है। पहले किसान व पशुपालक गेहूं की तूड़ी का ही पशुओं के चारे के लिए प्रयोग करते थे। अब सर्दी के मौसम में पराली बराबर मात्रा में पशुओं को खिला रहे हैं। किसान परमिंद्र ने बताया कि वह हर साल 10 से 15 एकड़ की पराली बेचता है। वह इस रुपये को धान कटाई में लगा देता है। इस तरह उसकी धान कटाई मुफ्त हो जाती है।
पानीपत, सोनीपत, करनाल व जींद समेत आसपास के जिलों से हर साल लाखों टन पराली उत्तर प्रदेश के व्यापारी खरीदकर ले जा रहे हैं। वे वहां पराली बेचते हैं। ये व्यापारी यहां किसानों से संपर्क रखते हैं। इस समय पराली का रेट प्रति एकड़ आठ हजार रुपये है। कुछ व्यापारी पराली खरीदकर आसपास के खेतों में इकट्ठा कर लेते हैं। वे इसे बाद में चारे के रूप में बेचते हैं। पशुपालक विनोद खर्ब ने बताया कि इस समय पराली प्रति क्विंटल 600 रुपये है, जबकि गेहूं की तूड़ी 850 से 900 रुपये क्विंटल है। सर्दी के मौसम में पशुओं के लिए पराली लाभदायक भी है। गेहूं की तूड़ी से पराली का रेट भी कम है। पशुपालक इसलिए इसे पसंद करते हैं।
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पानीपत में शनिवार को एयर क्वालिटी इंडेक्स 298 रहा। जबकि दिल्ली एनसीआर में यह आंकड़ा 350 के पार है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) इसके आधार पर दिल्ली और एनसीआर में ग्रैप-3 लागू कर चुका है। ऐसे में पानीपत में भी ग्रैप-3 की शर्तों को लागू किया गया है। इन सबके चलते उद्यमियों की परेशानी बढ़ गई है। हरियाणा एन्वॉयरमेंट सोसायटी के प्रदेशाध्यक्ष एवं डाई उद्यमी भीम सिंह राणा ने बताया कि पानीपत और दिल्ली के एक्यूआई में बहुत अंतर है। सीपीसीबी को शर्तों पर पुन: विचार करने की आवश्यकता है।
कृषि विभाग किसानों को लगातार जागरूक कर रहा है। किसान पराली प्रबंधन को लेकर गंभीर हैं। इस बार सैटेलाइट से अब तक 20 मामले सामने आए हैं। यह पिछले वर्षों से काफी कम हैं। यह आने वाले समय के लिए सकारात्मक रहेगा।
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- डॉ. आदित्य डबास, उप निदेशक, कृषि विभाग, पानीपत।
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