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सिर दिया पर सार न दिया, अन्यायी और क्रूर औरंगजेब का गुरुर तोड़ दिया- हुड्डा

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पानीपत। 400वें प्रकाश पर्व पर पानीपत के सैक्टर 13-17 में आयोजित कार्यक्रम में मंच पर मौजूद मुख्यमंत्र - फोटो : Panipat
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पानीपत। गर्व की बात है कि आज हम ‘हिंद दी चादर’ श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश उत्सव मना रहे हैं। उनके दादा गुरु अर्जुन देव जी, खुद और उनकी पत्नी माता गुजरी जी, सुपुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी और उनके चारों पौत्र बाबा जुझार सिंह, अजीत सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह ने अपने धर्म, सिद्धांत, संस्कृति और स्वाभिमान के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उन्होंने सिर दिया पर सार न दिया, अन्यायी और क्रूर औरंगजेब का गुरूर तोड़ दिया।’’ यह बात रविवार को श्री गुरु तेग बहादुर जी के प्रकाश उत्सव में हिस्सा लेने पहुंचे पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कही।
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नेता प्रतिपक्ष ने सरकार से मांग की है कि ऐसी महान विभूति की याद में हरियाणा के जींद स्थित धमतान साहिब में अंतरराष्ट्रीय स्तर का कॉलेज और रिसर्च सेंटर बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अच्छी शिक्षा मिले और गरीब व दीन-दुखी की सेवा हो सके। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी सिर्फ एक धर्म के नहीं बल्कि पूरी मानवता के गुरु और पूजनीय हैं। उन्होंने उस दौर में देश, धर्म व मानवता के लिए बलिदान दिया जब देश मुगलों के अत्याचार झेल रहा था।
एक तरफ बुुराई और दूसरी तरफ मुगलों से लड़ी लड़ाइयां
हुड्डा ने कहा कि सिख धर्म का पूरा इतिहास हिंदुओं के लिए तड़प, सहानुभूति और बलिदान का रहा है। गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी तक सभी गुरुओं को दो मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा। एक तरफ देश में फैले अंधविश्वास, सामाजिक बुराइयां, कुरीतियां, रुढ़िवादिता और धार्मिक भावनाओं के शोषण के विरुद्ध संघर्ष किया। दूसरी तरफ मुगल शासकों के जुल्म, जबरदस्ती, अन्याय और धर्म परिवर्तन की चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया। उस दौर में उन्होंने अपने अनुयायियों में साहस, संगठन, समानता और बलिदान की भावना जगाई। उन्होंने देग-तेग फतेह, मीरी-पीरी की शानदार परंपरा को विकसित किया। लंगर और संगत प्रथा से संगठन, समानता और सौहार्द का निर्माण हुआ।
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कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए दिया था बलिदान
हुड्डा ने बताया कि वर्ष 1674 में जबरन धर्म परिवर्तन से पीड़ित कश्मीरी पंडित गुरु तेग बहादुर जी के पास रक्षा के लिए आए। गुरुजी ने धर्म परिवर्तन के खिलाफ मुगलों को चुनौती दी। औरंगजेब ने इसे अपने खिलाफ चुनौती माना। फलस्वरुप गुरुजी का उनके तीन साथियों (भाई मतीदास, भाई सतीदास और बाबा दयाला जी) सहित चांदनी चौक दिल्ली में सिर काट कर शहीद कर दिया।
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