पानीपत। पति की मौत के बाद बीमा कंपनी से बीमे का क्लेम लेने के लिए पत्नी ने तीन साल तक लड़ाई लड़ी। इसके बाद आयोग ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाकर भारतीय जीवन बीमा निगम को क्लेम के तीन लाख रुपये छह प्रतिशत ब्याज के साथ देने के आदेश दिए हैं।
आयोग ने कहा कि बीमा दावा खारिज करना सेवा में कमी और उपभोक्ता के साथ अन्याय है। यदि 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो देय राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। पानीपत के बबैल गांव की सुमन ने जिला उपभोक्ता आयोग में याचिका दाखिल की थी। उनका कहना है कि उनके पति तेजबीर ने 12 फरवरी 2021 को एलआईसी से दो जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। पहली पॉलिसी एक लाख रुपये और दूसरी दो लाख रुपये की थी।
सुमन दोनों पॉलिसियों में नामांकित थीं। पॉलिसी लेने से पहले एलआईसी द्वारा अधिकृत डॉक्टर से तेजबीर का मेडिकल परीक्षण कराया गया था, जिसमें रिपोर्ट सामान्य पाई गई। छह मार्च 2021 को तेजबीर की तबीयत बिगड़ने पर उन्हें करनाल के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान 10 मार्च 2021 को उनकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद सुमन ने समय रहते बीमा दावा पेश किया, लेकिन एलआईसी ने जांच के बाद यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक ने पॉलिसी लेते समय मधुमेह (डायबिटीज) से जुड़ी जानकारी छिपाई थी। बीमा कंपनी ने दावा किया था कि मृत्यु पॉलिसी जारी होने के 28 दिन के बाद ही मृत्यु हो गई। जिस कारण क्लेम नहीं दिया जा सकता।
मामले की सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग के चेयरमैन डॉ. आरके डोगरा ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि बीमा कंपनी यह साबित करने में असफल रही कि बीमारी का मृतक की मृत्यु से कोई सीधा संबंध था। आयोग ने यह भी टिप्पणी की कि जब पॉलिसी जारी करते समय बीमा कंपनी ने स्वयं मेडिकल परीक्षण कराया था, तो बाद में बीमारी का हवाला देकर दावा खारिज करना उचित नहीं है।