पानीपत। ऐतिहासिक देवी मंदिर मां के भक्तों की आस्था का केंद्र है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु नवरात्र पर दर्शन करने आते हैं। दुर्गा सप्तमी पर तो यहां तिल डालने को भी जगह नहीं मिलती। देवी मंदिर में चैत्र नवरात्र में दो दिन से श्रद्धालुओं का आना जारी है।
मंदिर के पुुजारी पंडित शिवदत्त शुक्ला ने बताया कि ऐतिहासिक देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष आस्था है। मंदिर के कपाट सुबह तीन बजे ही खोल दिए जाते हैं। इसके बाद स्नान कराकर माता को सजाया जाता है। देश-विदेश के विभिन्न प्रकार के रंग-बिरंगे फूलों का प्रयोग किया जाता है। सुबह व शाम को भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु सुबह पांच से दोपहर 12 बजे और शाम को चार से रात नौ बजे तक दर्शन कर सकते हैं। छठे, सातवें व आठवें नवरात्र को पूरे दिन दर्शन किए जा सकते हैं।
मंदिर कमेटी के प्रधान काकू बंसल ने बताया कि देवी मंदिर देवी दुर्गो को समर्पित है। यह मुख्य मंदिर है और पर्यटकों को आकर्षित करता है। मंदिर एक तालाब के किनारे स्थित है। जो अब सूख गया है। तालाब में पार्क बनाया गया है। आसपास के लोग सुबह व शाम को टहलने आते है। मंदिर का पुन: निर्माण किया गया है। यह सुंदर तरीके से भारतीय वास्तुकला की एक सुंदर छवि को दर्शाता है। मंदिर का निर्माण 18वीं शाताब्दी में मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ ने करवाया था। कहते हैं कि मराठों में देवी मां के प्रति अटूट श्रद्धा होती है।धार्मिक स्थापत्य शैली की अनूठी मिसाल मंदिर में है। मुख्य द्वार पर सुशोभित 16 टन वजनी अष्टधातु की मां शेरावाली की प्रतिमा जगह है। यह प्रतिमा 2015 में स्थापित की गई।
मां की भक्त सरोज जैन ने बताया कि उसकी देवी में विशेष आस्था है। वह 40 साल से मंदिर आकर पूजा-अर्चना कर रही है। मां की महिमा निराली है।
साईबाबा चौंक वासी मुकेश कुमार ने बताया कि उसकी कॉलोनी व आसपास बहुत से मंदिर हैं, लेकिन उसकी देवी मां में विशेष श्रद्धा है। वह करीब 12 साल से देवी मंदिर में मां भगवती की पूजा व दर्शन के लिए आ रहा है।