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संस्कृत से संस्कृति सुरक्षित : राघवदेव

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समालखा। प्रदेश के स्कूलों में कक्षा छठी से दसवीं तक संस्कृत की अनिवार्यता के संकल्प के साथ रविवार को पट्टीकल्याणा के सेवा साधना ग्राम विकास केंद्र में संस्कृत भारती का दो दिवसीय प्रांत सम्मेलन शुरू हुआ। इस दौरान संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए संस्कृत के अनिवार्यता पर जोर दिया गया।
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इस मौके पर मुख्यातिथि महामंडलेश्वर स्वामी राघवदेव महाराज ने कहा कि संस्कृत है तो संस्कृति है। भारत की संस्कृति विश्व प्रसिद्ध है। इसे बनाए रखना हम सब का दायित्व है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के प्रति आज समय और माहौल दोनों अनुकूल है। महामंडलेश्वर ने कहा िक समय अनुकूल हो तो सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। रामलला मंदिर निर्माण इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
प्रांत सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य वक्ता संस्कृत भारती के अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख उल्लास चंद ने कहा कि कार्यकर्ता के हृदय में अग्नि, पैरों में गति, मुख में मधुरता और मस्तिष्क में शीतलता का होना जरूरी है। जब तक ऊर्जा नहीं होगी, कार्य की शुरुआत हो ही नहीं हो पाएगी।
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उन्होंने कहा कि मधुर वाणी से शत्रु को भी अपना बनाया जा सकता है। मस्तिष्क शीतल होगा तो रास्ता सही अपनाया जाएगा। रास्ता सही अपनाया तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं हो पाएगा। उद्घाटन सत्र में विधानसभा में संस्कृत में शपथ लेने वाले रेवाड़ी के विधायक लक्ष्मण यादव, करनाल के विधायक जगमोहन आनंद, इंद्री के विधायक रामकुमार कश्यप काे भी सम्मानित किया गया। तीनों विधायकों ने विधानसभा में संस्कृत के प्रत्येक कार्य की समर्पण भाव से आवाज उठाने की बात कही। सम्मेलन में संगठन विस्तार में कार्यकर्ताओं की भूमिका के साथ-साथ आगामी योजनाओं पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता संस्कृत भारती के प्रांत अध्यक्ष डॉ. सोमेश्वर दत्त ने की। इस अवसर पर प्रो. यशवीर, नरेंद्र कुमार, संपर्क प्रमुख डॉ. जोगेंद्र, प्रमोद शास्त्री, भूपेंद्र, ईशम सिंह, डॉ. रामनिवास, हरिदेव शास्त्री, सतेंद्र कुमार व डॉ. सुरेश कुमार मु़ख्य रूप से उपस्थित रहे।
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