पानीपत। गुरुदेव सुदर्शन लाल महाराज के शिष्य अरुण मुनि महाराज ने मंगलवार को धर्मसभा में चातुर्मास के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने चातुर्मास को धर्म की खेती का मौसम बताया। कहा कि चातुर्मास आत्मा के उत्थान का उत्सव है।
अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा में मुनि महाराज ने कहा कि चातुर्मास केवल ऋतुजन्य ठहराव नहीं आत्मा को चेतनता, संयम और साधना की ओर मोड़ने का काल है। यह वर्षा ऋतु में आने वाला वह विशेष चार महीनों (आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक) का कालखंड है जब जैन साधु-संत एक स्थान पर ठहरते हैं। यह ठहराव पर्यावरण की विवशता से नहीं बल्कि आत्मशुद्धि, तपस्या और लाखों सूक्ष्म जीवों की रक्षा के उद्देश्य से होता है।
अरुण मुनि महाराज ने कहा कि दुनिया बदल गई लेकिन जैन साधु नहीं बदला। भगवान महावीर से अब तक जैन मुनि भगवान की आज्ञा अनुसार नंगे पांव ही विहार करते हैं। घरों से मांगकर भोजन करते हैं। बिजली, पंखा और माइक आदि का प्रयोग नहीं करते। संसार में एक जैन साधु ऐसा है जो पानी भी मांगकर पीता है। अपने आप नलके से पानी नहीं पीता।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल साधुओं के लिए नहीं अपितु गृहस्थ समाज के लिए भी आत्मिक जागरण और आत्मसंयम का दुर्लभ अवसर है। चातुर्मास में किया गया तप, व्रत, ध्यान, उपवास और सेवा सामान्य काल से कई गुना फल देता है। यह आत्मा की यात्रा प्रारंभ करने का श्रेष्ठ अवसर है।
जीवन में बदलाव के चार सूत्र
मुनि महाराज ने जीवन में बदलाव के लिए चार मौलिक सूत्र बताए। कहा कि भगवान की पहली आज्ञा सामयिक है, आत्मा में स्थिर होना ही सच्चा धर्म है। दान कई गुना होकर लौटता है, यह आत्मिक उन्नति का साधन है। सेवा से मनुष्य का अहंकार शून्य होता है, विनम्रता आत्मा को प्रभु से जोड़ती है। आत्मा की शुद्ध अवस्था ही ईश्वर है, ईश्वर कहीं बाहर नहीं, वह हमारे भीतर ही है।