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तीन साल में डेढ़ हजार करोड़ बढ़ा कारपेट का कारोबार

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तुर्की और चीन के कारपेट को टक्कर देते हुए टेक्सटाइल के बाद अब कारपेट उद्योग में भी पानीपत की चमक दिखने लगी है। पानीपत का कारपेट उद्योग इस साल छह हजार करोड़ तक पहुंच गया है। इसमें पिछले तीन साल मेें डेढ़ हजार करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है। कारपेट से जुड़े 50 नए उद्योग भी पिछले पांच साल के दौरान स्थापित किए गए हैं। कारपेट इंडिया की टफटियल, पैटलूम, चीन की सर्कुलर और बेल्जियम की वेंडेवला मशीन से बनाया जा रहा है। पानीपत के कारपेट की तुर्की से टक्कर है और पहली बार 1980 में कारपेट का एक्सपोर्ट विदेशों में किया गया था।
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- विदेशों में पसंद किया जा रहा पानीपत का कारपेट
पानीपत का कारपेट यूरोप, आस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका और अरब के देशों के लोगों की पसंद बन चुका है। यहां पर सबसे ज्यादा कारपेट एक्सपोर्ट किया जा रहा है। उद्यमियों का मानना है कि सरकार थोड़ा सहयोग करे तो वे कारपेट कारोबार में हरदोई को पीछे छोड़ देंगे। फिलहाल पानीपत हरदोई के बाद देश में सबसे अधिक कारपेट का उत्पादन करने वाला शहर है।
- हर रोज 10 करोड़ का कारपेट हो रहा तैयार
पानीपत का कारपेट हैंडमेड है। इस वजह से इसकी कीमत ज्यादा है। जबकि तुर्की और चीन में बना कारपेट मशीन से बनाया जाता है। मशीन से बना कारपेट सस्ता है, इसलिए उसकी मांग अधिक है। पानीपत में एक दिन में 10 करोड़ का कारपेट तैयार हो रहा है। यहां पर वुलन, जूट, पैट और पीपीआरएम कारपेट बनाए जा रहे हैं।
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- बेल्जियम और जर्मनी से मशीनों को आयात करने में मिले सहयोग
तुर्की का कारपेट मार्केट में आने से पहले भारतीय कारपेट कारोबार को मात्र चीन से ही चुनौती मिली थी। अब तुर्की में मशीन से बन रहा सस्ता कारपेट चुनौती बन रहा है। यहां बेल्जियम और जर्मनी की बनी मशीनों से कारपेट तैयार किया जा रहा है। इससे कम समय पर अधिक उत्पादन होता है। मशीन से कारपेट बनाने पर कम समय में कई प्रकार के डिजाइन प्रोसेस में होते हैं। वहीं भारत में हाथ से कारपेट बनाने में तीन से चार दिन लगते हैं। मशीन से एक दिन में कई हजार मीटर कारपेट तैयार होता है। ऐसे में बेल्जियम और जर्मनी की मशीनों को आयात करने में सहयोग मिलना चाहिए।
- पानीपत से निर्यात बढ़ा, ढाई हजार करोड़ तक पहुंचा
पानीपत में इस समय कारपेट के 250 उद्योग लगे हुए हैं और 3 हजार करोड़ से अधिक का कारपेट निर्यात हो रहा है। मशीनी कारपेट 30 से 40 रुपये प्रति फुट पड़ता है। जबकि हाथों से बना कारपेट 125 रुपये फीट पड़ता है। इसलिए भारत का कारपेट तुर्की व चीन से तीन गुना महंगा पड़ता है। पानीपत के 70 प्रतिशत उद्योगों में हाथ से कारपेट बनते हैं।
- सरकार इंस्टीट्यूट खोले तो कारपेट हब बन सकता है पानीपत
सरकार से मांग है कि पानीपत में भी कारपेट स्किल को विकसित करने के लिए इंस्टीट्यूट खोला जाए, ताकि उन्हें प्रशिक्षित श्रमिक मिल सकें। अब पानीपत का कारपेट कारोबार छह हजार करोड़ का हो गया है। 250 उद्योग को प्रशिक्षित श्रमिक मिलेंगे तो पानीपत को कारपेट हब बनाया जा सकता है।
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- अनिल मित्तल, सचिव, कारपेट एसोसिएशन, पानीपत।
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