समालखा। उपेंद्र मुनि ने जैन स्थानक में प्रवचन करते हुए सांसारिक लाभ की अपेक्षा बोधि लाभ को वास्तविक लाभ बताया है।
श्रद्धा, आत्मा व शरीर की भिन्नता का बोध कराने वाला ज्ञान एवं विशुद्ध ब्रह्मचार्य के साथ पालन किया गया चरित्र, आत्म बुद्धि का लाभ, व्यवहार बुद्धि का लाभ तथा सच्ची समझ आ जाना ही बोधि लाभ है। जिसकी तुलना संसार का कोई लाभ नहीं कर सकता। विभिन्न गतियों और योनियों में भटकते-भटकते जीवात्मा जब मनुष्य जीवन को भी आर्य क्षेत्र में, उत्तम कुल, नीरोगिता, दीर्घा घाटियां पार होने के बाद फिर सच्ची श्रद्धा, सच्चा ज्ञान एवं विशुद्ध चरित्र की प्राप्ति होती है। कितना दुष्कर है बोधि प्राप्त करना। बोधि लाभ दो तरह से होता है।
प्रथम में कौन हूं, कहां से आया हूं और मरने के बाद मेरी आत्मा का भविष्य क्या होगा। मेरा लाभ क्या है और मेरी आत्मा अभी कैसी परिस्थिति में है। इस मौके पर इंदुश मुनि ने अपने संदेश में कहा कि जिसका किसी में प्रेम राग होता है। संवाद