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कृष्ण-नाम का थोड़ा-सा प्राकट्य दूर भगाएगा अज्ञान के अंधकार : चित्रलेखा

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पानीपत। स्वयं में बहुत सी कमियों के बावजूद यदि हम स्वयं से प्रेम कर सकते है, तो फिर दूसरों में थोड़ी कमियों की वजह से घृणा कैसे कर सकते हैं। भगवान की भक्ति कीजिए जिनका नाम सूर्य के समान है। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर रात्रि का अंधकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार कृष्ण-नाम का थोड़ा-सा भी प्राकट्य अज्ञान के सारे अंधकार, जो विगत जन्मों में संपन्न बड़े-बड़े पापों के कारण हृदय में उत्पन्न होता है, दूर भगा सकता है।
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उक्त विचार, देवी चित्रलेखा ने प्राचीन श्री देवी मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यक्त किए। कथा के छठें दिन देवी चित्रलेखा ने भगवान के द्वारा की गई लीलाओं का श्रवण कराते हुए बताया कि ब्रज में की गई भगवान की लीला स्वयं नारायण भी नहीं कर सकते। इन लीलाओं के द्वारा भक्तों को रिझाना सिर्फ भगवान कृष्ण ही कर सकते हैं। वृंदावन भगवान का घर हुआ, इसलिए प्रभु ने सब लीलाओं को एक साधारण बालक की तरह किया। इस नन्हे से बालक ने अपनी मनमोहक लीलाओं के द्वारा गोपियों का मन ऐसा मोहा कि गोपियों को अब न भोजन की सुध रहती है, न अपने परिवार की और न ही किसी काम-धाम की। गोपियां दिन-रात कन्हैया का दर्शन करने को लालायित रहती हैं।

चित्रलेखा ने कथा में वरुण लोक से नंद बाबा को छुड़ाकर लाने की कथा और अन्य कथाओं का श्रवण कराते हुए रासलीला का वर्णन श्रवण कराया। प्रभु के एक स्वरूप के साथ दो गोपियों ने महारास किया। इसके पश्चात प्रभु के मथुरा गमन की कथा, प्रभु की शिक्षा, उद्धव संवाद, मामा कंस वध आदि कथा का श्रवण कराकर भगवान कृष्ण और माता रुक्मिणी के विवाह की कथा कहकर कथा के छठे दिवस को विश्राम दिया।
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मुख्यातिथि विपुल शाह, विकास पाहवा व गोपाल तायल रहे। इस मौके पर रमेश जांगड़ा, श्रीनिवास वत्स, संजय सिंह, अंकित गोयल, सुभाष कंसल, बबलू राणा, कपिल गोयल, मनोज जैन, राजपाल शर्मा, पवन सिंघला, आशु गुप्ता व प्रदीप गुप्ता मौजूद रहे।
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