संवाद न्यूज एजेंसी
समालखा। नई अनाज मंडी स्थित जैन स्थानक में उपेंद्र मुनि ने साधक साधना और सिद्धि के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि साधक एक ऐसा व्यक्ति होता है जो आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक विशेष विधि का पालन करता है। साधना वह प्रक्रिया या नियम है जो साधक अपनाता है और सिद्धि वह लक्ष्य या परिणाम है जो उस साधना के माध्यम से प्राप्त होता है। जैसे आंतरिक शुद्धता, मन पर नियंत्रण या अलौकिक क्षमताएं। यह यात्रा आत्म-ज्ञान और व्यक्तिगत रूपांतरण की है। भारतीय धर्मों और परंपराओं में साधक वह व्यक्ति है जो किसी विशेष लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक जीवन-पद्धति या साधना का अनुसरण करता है। एक अच्छा साधक आत्म-नियंत्रित, आदर्शवादी और पवित्र होता है।
वह उचित प्रयास, अभ्यास और नियमों का पालन जो एक निश्चित लक्ष्य (सिद्धि) प्राप्त करने के लिए किया जाता है। वह अंतिम लक्ष्य या परिणाम जो साधना के बाद प्राप्त होता है। यह किसी भी प्रकार की पूर्णता, उच्च ज्ञान या अलौकिक शक्ति हो सकती है। कुछ लोग इसे अपनी चेतना के रूपांतरण के रूप में देखते हैं, तो कुछ के लिए यह विशेष क्षमताओं जैसे अणिमा का विकास हो सकता है। सिद्धि तभी सार्थक है, जब वह साधक के व्यक्तित्व के परिष्कार, चुंबकीय आकर्षण के विकास और दूसरों के लिए कुछ करने की प्रवृत्ति के साथ आती है।