माई सिटी रिपोर्टर
पानीपत। आचार्य लालमणि पांडेय महाराज ने कहा कि राजा बलि ने भगवान को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया था। इसी प्रकार आज भी लोगों को भगवान की शरण में जाकर दान और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए तथा दान करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।
वे प्राचीन सिद्ध श्री देवी मंदिर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन वीरवार को प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि दानवीर लोगों में राजा बलि का नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। दान हमेशा अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही करना चाहिए और धन का उपयोग धर्म तथा समाज के कार्यों में करना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि राजा बलि की कथा सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में से एक है, जो भगवान विष्णु के वामन अवतार और असुर राजा महाबली के परम त्याग एवं भक्ति को दर्शाती है। उन्होंने बताया कि राजा बलि ने अपनी शक्ति और गुरु शुक्राचार्य के सहयोग से देवराज इंद्र को पराजित कर स्वर्ग सहित तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था।
स्वर्ग छिन जाने के बाद देवताओं ने भगवान विष्णु की शरण ली। भगवान विष्णु ने देवताओं की रक्षा और ब्रह्मांड का संतुलन बहाल करने का संकल्प लिया। इसके बाद उन्होंने माता अदिति के गर्भ से वामन देव के रूप में अवतार लिया और राजा बलि के अश्वमेध यज्ञ में पहुंचे।
यज्ञ के दौरान वामन देव ने राजा बलि से दान में तीन पग भूमि मांगी। राजा बलि ने सहर्ष स्वीकृति दी। वामन देव ने दो पग में ही पूरी पृथ्वी और स्वर्ग नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर राजा बलि ने अपना सिर प्रस्तुत कर दिया और भगवान से तीसरा कदम अपने सिर पर रखने का अनुरोध किया। उनके इस महान समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य प्रदान किया।
कथा के उपरांत महावीर बंसल, धनराज बंसल, शिवकुमार बंसल और मुकेश बंसल ने आरती की।