पानीपत। जिले में आज भी 20 गांव ऐसे हैं, जिनका खुद का न सरपंच है और न ये पंचायत हैं। ये गांव और इनके ग्रामीण दूसरी पंचायतों पर निर्भर हैं। हालांकि इनमें से अधिकतर गांव ऐसे हैं जो शहर के दायरे में आ चुके हैं। यहां कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं। इनके नाम तक बदले जा चुके हैं। कई गांव ऐसे हैं, जिनका अब नामोनिशां तक नहीं है। यहां के लोग दूसरे गांव में शिफ्ट हो चुके हैं। स्थितियां जो भी हो लेकिन आज भी ये गांव सरकारी रिकॉर्ड में जिंदा हैं।
बात करते हैं बापौली ब्लॉक के लधुपुर और बहाओदिनपुर गांव की। बताया जा रहा है कि ये गांव कई साल पहले यमुना की चपेट में आ गए। यहां के लोगों ने अपना डेरा दूसरे गांव में डाल लिया। इन गांव को अब स्थानीय लोग चिरागबुझ के नाम से जानते हैं। यमुना में गांव जाने के बाद लधुपुर और बहाओदिनपुर के निवासी रिसपुर आकर बस गए और तब से यहीं बसे हैं। लेकिन ये गांव आज भी सरकारी रिकॉर्ड में हैं।
दूसरी ओर सनौली-बापौली ब्लॉक से लगने वाले गांव मिर्जापुर और रहीमपुर खेड़ी को भी आज तक अपने गांव का सरपंच नहीं मिला। न कभी यहां पंचायत बनीं। ये गांव आज भी गोयला कलां गांव की पंचायत पर निर्भर हैं। गांव कुडला का नाम अब पत्थरगढ़ हो चुका है। डाडौला और डाडौली गांव एक ही बताए जाते हैं। जो एक सड़क के इस ओर तो दूसरा सड़क के दूसरी ओर हैं।
इधर समालखा ब्लॉक में गांव जीतगढ़ और गढ़ी केवल के पास भी खुद की पंचायत नहीं है। ये गांव आज भी जौरासी खास से जुड़े हैं। इनकी पंचायत, सरपंच, पंच ही इन गांवों के विकास कार्य करवाते हैं। इन गांव के लोगों को अपने कामों के लिए जौरासी जाना पड़ता है। इसराना ब्लॉक का रामनगर गांव आज भी बांध की पंचायत से जुड़ा है। गांव में करीब 300 ग्रामीण हैं और करीब सौ वोटर भी हैं। खास बात यह है कि इस गांव के लोगों को वोट डालने के लिए भी बांध जाना पड़ता है।
पानीपत ब्लॉक में तो ऐसे कई गांव होते थे, जो सरकारी रिकॉर्ड में तो आज भी गांव हैं लेकिन यहां कॉलोनियां बस चुकी हैं। इस वजह से इन कॉलोनियों के नाम भी दर्ज हैं। इनमें से कुछ गांव तो अब निगम का हिस्सा भी हो चुके हैं। हालांकि अब इनके पुराने नाम सिर्फ एरिया को समझाने के लिए काम आते हैं। इनमें अलीअश्गरपुर, सराय बछरा, रत्तीपुर, गद्दीवाड़ा, तरफ अफगान, बागशेर अफगान, सराय तिलखन, काबुल बाग, अज्जीजुल्लापुर, तरफ राजपूतान, तरफ मग्दूमगान, पानीपत तरफ इंसार, सौदापुर नाम हैं। मतलौडा ब्लॉक में शादीपुर गांव का नाम बदलकर कवी रखा जा चुका है। बेगुपर बापनौत गांव ऐसा है जो पंचायती तौर पर आज भी वैसर गांव पर और जीतगढ़, उरलाना खुर्द पर निर्भर है।
हमारी नहीं कोई पंचायत
जीतगढ़ के अनिल कहते हैं कि हमारे गांव में कोई पंचायत नहीं है। हमारा गांव जीतगढ़, उरलाना खुर्द पंचायत से जुड़ा है। उरलाना से ही हर बार सरपंच बनता है। अगर हमारे गांव का अलग सरपंच बने तो गांव को बेहतर तरीके से विकास हो सकता है। इसके लिए सरकार से डिमांड की जाएगी।
निगम में शामिल हो चुके हैं कई गांव
पूर्व जिला पार्षद देव मलिक का कहना है कि पानीपत ब्लॉक में कुछ गांव निगम में शामिल हो चुके हैं। वहीं, कुछ वो जगह जो एक प्रकार से जोन थी वहां कॉलोनियां बस चुकी हैं। जिनके अब नाम तक भी बदल चुके हैं। अब पानीपत ब्लॉक का आउटर एरिया तो तकरीबन निगम के अधीन आ चुका है।
यमुना में गए गांव इसलिए चिरागबुझ- नरसिंह रावल, पूर्व सरपंच, रिसपुर
यमुना के तेज बहाव के चपेट में आ गए ये गांव
रिसपुर के पूर्व सरपंच नर सिंह रावल का कहना है कि गांव लधुपुर और बहाओदिनपुर गांव काफी साल पहले यमुना में चले गए। जिसके बाद यहां के ग्रामीण रिसपुर आकर बस गए। तब से रिसपुर समेत तीनों गांव के लोग यहीं रह रहे हैं। इनकी एक ही पंचायत है। हालांकि यमुना में अब इनकी जमीन जरूर निकली है, जहां से खेती करने जाते हैं।
अलग पंचायत हो तो मिलेगा अलग बजट
जीतगढ़ के अमित कुमार कहते हैं कि दूसरे गांव के बजट से हमारे गांव के विकास कार्य पूरे नहीं हो पाते। ज्यादातर बजट को संबंधित पंचायत गांव पर ही लग जाता है। जिला परिषद, ब्लॉक समिति से काम करवाने की उम्मीद की जाती है। इसलिए अलग पंचायत हो तो सरकार की ओर से अलग बजट मिल सकता है।
एक प्रक्रिया होती है गांव को पंचायत बनाने की
डीडीपीओ सुमित चौधरी ने बताया कि किसी भी गांव को पंचायत बनाने के लिए एक प्रक्रिया होती है। जिसमें गांव संबंधित पूरी डिटेल का एक केस बनाकर डीसी के मार्फत विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के पास जाता है। यहां से मंजूरी मिलने के बाद गांव को पंचायत का दर्जा दिया जाता है। इसमें अधिकारियों की टीम पहले गांव का मुआयना करती है। पंचायत बनाने के लिए कई प्रकार के सटीक कारण भी अनिवार्य होते हैं, जो गांव पूरा करता है। इसमें गांव की दस प्रतिशत आबादी इसके पक्ष में होनी चाहिए। ग्राम पंचायत का एक तिहाई भाग भी पंचायत बनवाने का प्रस्ताव पास करवाने के पक्ष में होना चाहिए।
अगर कोई गांव पंचायत बनने की सभी नियम व शर्तों को पूरा करता होगा तो सरकार के पास उसका प्रस्ताव भिजवाया जा सकता है। इसके बाद ग्रामीणों की ओर से गांव को पंचायत बनाने की डिमांड भी की जा सकती है। जिस पर सरकार उस गांव को पंचायत बनाने का फैसला ले सकती है। इसके लिए अलग अलग प्रकार के विभिन्न मापदंड होते हैं। जिनको पूरा करना आवश्यक होता है।
कृष्ण लाल पंवार, सांसद, राज्यसभा एवं पूर्व मंत्री।