पानीपत। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और छंटनी के 24 साल बाद भी शुगर मिल के कर्मचारियों को न तो इंसाफ मिला है और न ही मुआवजा। राहत के इंतजार में 30 कर्मचारियों की मौत और इतने ही कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
1996 में शराब बंदी के दौरान डिस्टलरी से हटाए गए 287 कर्मचारियों में से 78 कर्मचारियों को आज तक वापस नौकरी नहीं मिल पाई है। जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार छंटनी किए गए कर्मचारियों को नौकरी मिलनी चाहिए थी। इतना ही नहीं इन कर्मचारियों को दिया जाने वाला करीब 44 लाख रुपये मुआवजा भी नहीं मिल पाया है। इन कर्मचारियों के हक की लड़ाई लड़ रहे कर्मचारी यूनियन के महासचिव महाबीर शर्मा ने बताया कि वे खुद इसका शिकार हुए हैं। प्रबंधन द्वारा कई बार केवल उन्हें सरकारी नौकरी का लाभ देने का लालच दिया, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा कर सभी कर्मचारियों की नियमानुसार नौकरी वापस देने की मांग रखी।
ये था मामला
डिस्टलरी कर्मचारी यूनियन के महासचिव महाबीर शर्मा ने बताया कि 1996 में प्रदेश में बंसीलाल की सरकार थी, इस दौरान शराब बंदी की गई थी। इसलिए सरकारी आदेशों पर शुगर मिल की डिस्टलरी बंद कर दी गई। डिस्टलरी बंद होने से यहां के 287 कर्मचारियों को मिल प्रबंधन ने निकाल दिया। जिसके बाद कर्मचारियों ने न्याय के लिए अपने हक की आवाज हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट को लगाई। उच्चतम न्यायालय ने 2003 में आदेश जारी किए कि छंटनी किए गए कर्मचारियों को डिस्टलरी चलने के बाद वापस रखा जाए। न्यायालय के आदेशानुसार 287 कर्मचारियों को उनकी नौकरी वापस दी जानी चाहिए थी, लेकिन इनमें से नौकरी केवल 209 कर्मचारियों को ही मिल पाई। मिल प्रबंधन छंटनी किए गए इन कर्मचारियों को वापस लेने लगा। 2005 तक 207 कर्मचारियों को वापस रख लिया गया। बाकी बचे हुए 78 कर्मचारी 24 साल से मिल प्रबंधन को नौकरी वापस देने के लिए गुहार लगा रहे हैं। इन्होंने फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस पर माननीय न्यायालय ने श्रम न्यायालय में मिल प्रबंधन को कर्मचारियों को डिफाइन करने का मामला सौंप दिया। समय बदला, सरकारें बदली और मिल प्रबंधक भी बदलते गए, लेकिन इन कर्मचारियों को न्याय नहीं मिल पाया।
चौकानी वाली बातें
महाबीर शर्मा बताते हैं कि इस पूरे प्रकरण में हैरानी वाली बात ये रही कि अपनी नौकरी खो चुके 78 कर्मचारियों में से 30 कर्मचारियों की तो मृत्यु तक हो चुकी है। वहीं करीब 30 कर्मचारियों को उम्र रिटायरमेंट के पार जा चुकी हैं। बाकी के 16 कर्मचारी अब भी अपने न्याय के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। दूसरी चौंकाने वाली बात ये सामने आई कि माननीय न्यायालय के आदेशानुसार जब तक हटाए गए इन कर्मचारियों को नौकरी नहीं दी जाती, तब तक मिल प्रबंधन न तो बाहर से कोई कर्मचारी हायर करेगा, न ही किसी प्रकार का ठेका दिया जाएगा। कहीं भी जरूरत पड़ने पर मिल प्रबंधन प्राथमिकता के आधार पर इन कर्मचारियों को नौकरी देगा। इनके बावजूद भी मिल प्रबंधन अपनी मनमानी में मशगूल दिखाई दे रहा है। सालों से मिल में काम करवाने के लिए ठेके दिए जाते रहे हैं। मिल प्रबंधन ने छंटनी किए इन कर्मचारियों को न मुआवजा दिया न ही नौकरी पर वापस रखा।
सीएम-पीएम को लिख चुके हैं पत्र
शर्मा ने बताया कि इस बारे में वे मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री तक को पत्राचार के माध्यम से सूचित कर चुके हैं, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई न हो सकी। उन्होंने कई बार अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को चंडीगढ़ मुख्यालय तक शिकायत भेेजी, लेकिन सब व्यर्थ गया। उन्होंने बताया कि उनका विश्वास न्याय प्रणाली से उठ चुका है, लेकिन वे अपने अंतिम सांस तक इन परिवारों के हक की लड़ाई लड़ते रहेंगे।
अधिकारियों ने भी माना गलत हुआ है
इस बारे में जब शुगर मिल प्रबंधक व डिस्टलरी मैनेजर से बातचीत करने की कोशिश की गई तो उनसे संपर्क नहीं हो पाया। वहीं शुगर मिल प्रबंधक पीए एवं श्रम कल्याण अधिकारी संजीव शर्मा ने बताया कि इन कर्मचारियों के साथ गलत हुआ है। करीब 20 साल से हम भी इन्हें संघर्ष करते देख रहे हैं। यहां दो प्रकार के वर्कर थे, एक शुगर मिल खाते के थे। वहीं ये दूसरे लोग वॉशिंग ठेके पर लगे थे। ये भी सालों पुराने वर्कर थे, जिन्होंने सालों तक काम किया है। ये सभी प्रकार की सुविधा भी ले रहे थे। इनके साथ गलत हुआ है।
शुगर मिल प्रबंधन ने अन्याय किया जो अब तक जारी है। सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। आधे कर्मचारियों की मौत हो चुकी है। आधे से ज्यादा रिटायर हो चुके हैं। छंटनी के 24 साल बाद भी कर्मचारियों को न तो इंसाफ मिला है, न ही मुआवजा मिल पाया है।
महावीर शर्मा, महासिचव, डिस्टलरी कर्मचारी यूनियन।