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शुगर, दमा रोगियों की जांच के लिए मशीन नहीं

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पानीपत। सिविल अस्पताल में नर्व कंडक्शन और स्पाइरोमेट्री मशीन नहीं होने के कारण मरीजों की जांच नहीं हो पा रही है। नर्व कंडक्शन से नसों और स्पाइरोमेट्री मशीन से फेफड़ों की जांच होती है। ऐसे में जिले के दो लाख मरीज रोहतक पीजीआई और निजी अस्पतालों के भरोसे हैं।
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शुगर के मरीजों की नसें कमजोर हो जाती हैं। हाथ पैर काम करना बंद कर देते हैं। हाथ की हथेलियां व पैर के पंजे सुन्न होने लगते हैं। नर्व कंडक्शन मशीन से जांच के बाद ही नसों की वास्तविक स्थिति का पता चल पाता है। लकवा, कार्पल टनल के मरीजों की जांच भी इसी मशीन से की जाती है। सिविल अस्पताल में शुगर के मरीजों के लिए सिर्फ प्राथमिक उपचार ही है।
800 से 1500 रुपये में नसों की जांच : शरीर के नसों की जांच का टेस्ट शहर के चार निजी अस्पतालों में है। इनमें टेस्ट की फीस 800 से 1500 रुपये तय है। इन्हीं अस्पतालों में नर्व कंडक्शन मशीन हैं। ऐसे में गरीब लोग टेस्ट की फीस देने के योग्य नहीं है। उन्हें टेस्ट के लिए रोहतक पीजीआई में जाना पड़ता है।
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800 से 1000 रुपये में फेफड़ों की जांच : फेफड़ों की जांच का टेस्ट शहर के 5-8 निजी अस्पतालों में उपलब्ध है। टेस्ट की फीस 800-1000 रुपये तय की गई है। सिविल अस्पताल में हर रोज औसतन 10-15 दमा रोगी आते हैं। जिनको टेस्ट के लिए खानपुर मेडिकल कॉलेज और रोहतक पीजीआई रेफर किया जाता है।
इसलिए जरूरी है स्पाइरोमेट्री मशीन : स्पाइरोमेट्री मशीन से पता चलता है कि फेफड़े कितना काम कर रहे हैं। सांस लेने में मरीज को कैसे दिक्कत हो रही है। इसे स्पाइरोमेट्री मशीन से ही जांचा जा सकता है। सिविल अस्पताल में आने वाले ऐसे मरीजों को ऑक्सीजन देकर रोहतक पीजीआई रेफर किया जाता है।
10 हजार रुपये की आती है मशीन : स्पाइरोमेट्री मशीन मार्केट में अलग-अलग गुणवत्ता में उपलब्ध है। इसकी कीमत 10 हजार रुपये से शुरू होती है। इसमें फूंक मारकर फेफड़ों की क्षमता को आंका जाता है। इतनी कम कीमत होने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग ने इसे स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध कराने पर ध्यान नहीं दिया है। फेफड़ों की जांच के लिए रोगियों को खानपुर मेडिकल कॉलेज या रोहतक पीजीआई रेफर करना पड़ता है।
सिविल अस्पताल में नर्व कंडक्शन व स्पाइरोमेट्री मशीन नहीं है। ऐसे टेस्ट रोहतक पीजीआई में होते हैं। डेढ़ साल पहले अस्पताल की ओर से विभाग को मशीनों की मांग भेजी गई थी। मशीनें उपलब्ध कराने का फैसला अधिकारी लेंगे। हमारा प्रयास है कि मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिले।
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-डॉ. आलोक जैन, एमएस सिविल अस्पताल
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