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द्रोणाचार्य के अभाव में बच्चे कैसे बनेंगे अर्जून 18-12-57

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फोटो संख्या-7 व 8
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द्रोणाचार्य के अभाव में बच्चे कैसे बनेंगे अर्जुन
जिले के राजकीय स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते विद्याथयों की शिक्षा पर पड़ रहा असर
25 : 1 की जरूरत, 29:1 है शिक्षकों की वर्तमान स्थिति
रवीन्द्र नैन
पानीपत।
कहावत है- गुरू बिना ज्ञान नहीं। अर्थात जीवन में आगे बढ़ने के लिए गुरू का महत्व सबसे अधिक होता है क्योंकि गुरू के मार्गदर्शन के बिना आगे बढ़ना कठिन होता है। हालांकि बच्चे के जन्म लेने के बाद बच्चे की सबसे पहली गुरू उसकी मां होती है। स्कूल में दाखिले के बाद यह जिम्मेदारी शिक्षक के कंधों पर होती है। यदि बच्चे को शिक्षक रूपी द्रोणाचार्य नहीं मिलेगा तो वह अर्जुन कैसे बन पाएगा? इन दिनों जिले के विभिन्न स्कूलों में यहीं स्थिति बनी है जहां शिक्षकों की भारी कमी महसूस की जा रही है। शायद यही कारण है कि बच्चों का रूझान साल-दर-साल निजी स्कूलों की ओर बढ़ता जा रहा है जिससे राजकीय स्कूलों में बच्चों की संख्या में निरंतर कमी आती जा रही है।
आंकड़ों पर नजर डाले तो पिछले पांच सालों के दौरान राजकीय स्कूलों में बच्चों की संख्या में प्रतिवर्ष औसतन 5 प्रतिशत की कमी हुई है अर्थात 2014-15 से अब तक लगभग 25 प्रतिशत बच्चे सरकारी से निजी स्कूलों की ओर पलायन कर चुके हैं। शिक्षकों के आंकड़ों पर नजर डाले तो इस समय जिलेभर के 424 राजकीय स्कूलों में शिक्षकों के लगभग 290 पद खाली हैं। इनमें जेबीटी अध्यापकों के 70 पद, सेकेंडरी कक्षाओं के लिए 80 पर और हायर सेकेंडरी के लिए 140 पद खाली हैं। विभिन्न स्कूलों के प्राचार्य से बात करने पर पता चला कि विद्यालयों में अधिकतर विज्ञान, गणित, हिंदी व संस्कृत आदि के पद खाली हैं। खाली पड़े पदों को भरने की तरफ सरकार द्वारा भी कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
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निजी स्कूलों की ओर बढ़ रहा रुझान
राजकीय स्कूलों में शिक्षकों की कमी और शिक्षा के स्तर को देखते हुए बच्चों का रुझान निजी स्कूलों की ओर बढ़ा है जिससे राजकीय स्कूलों में विशेषकर प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों की संख्या में काफी कमी आई है। बच्चों व अभिभावकों की मानें तो राजकीय स्कूलों में किसी न किसी विषय विशेष के अध्यापकों की अक्सर कमी खलती है। जब बच्चों को किसी विषय विशेष का पूरा ज्ञान नहीं मिल पाएगा तो बच्चे अपने जीवन के सफर में ऊंचे कैसे उठ पाएंगे?
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खाली कक्षाओं में मस्ती करते हैं बच्चे
किसी विषय विशेष के अध्यापक की कमी के कारण जहां बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है वहीं बच्चे खाली कक्षा के दौरान मस्ती करते रहते हैं। हालांकि जिन स्कूलों में प्रबंधन ज्यादा बेहतर होता है, वहां स्कूल प्राचार्य द्वारा खाली कक्षा में भी बच्चों को किसी विषय विशेष का रिवाइज आदि करवाया जाता है। मडलौडा के राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य रणधीर सिंह ने बताया कि वे स्कूल में बेहतर प्रबंधन रखते हैं और खाली पीरियड के दौरान भी बच्चों को व्यवहार कुशल बनाने का प्रयास किया जाता है।
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जिले में क्या है अध्यापकों की स्थिति?
वर्ग वर्तमान अध्यापक संख्या खाली पद
जेबीटी 1300 70
सेकेंडरी 950 80
हायर सेकेंडरी 820 140
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25 : 1 के अनुपात की होती है जरूरत
राज्य सरकार के निर्देशानुसार राजकीय स्कूलों में बच्चों और शिक्षकों का 25 : 1 का अनुपात होना चाहिए अर्थात 25 बच्चों पर एक शिक्षक की आवश्यकता होती है। हालांकि पहले यह अनुपात 35 : 1 था जिसे बीते समय में बच्चों की सुविधा के अनुरूप कम किया गया था। शिक्षकों की कमी के कारण इस समय लगभग 29 बच्चों पर एक शिक्षक कार्य कर रहा है। जिले के राजकीय स्कूलों में इस समय लगभग 86 हजार विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
वर्जन-
यह मामला उनके संज्ञान में है। नये सत्र से शिक्षा पर असर न पड़े अध्यापकों की नियुक्ति के लिए मुख्यालय को लिखा जाएगा।
-सुमेधा कटारिया, उपायुक्त पानीपत।
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