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सजा का उद्देश्य आरोपी को पीड़ा देना नहीं, बल्कि उसके कृत्य के परिणामों का अहसास कराना: हाईकोर्ट

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चंडीगढ़। 18 साल पुराने वाहन हादसे में दो लोगों की मौत के मामले में दोषी के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उसकी दो साल की सजा को रद्द करते हुए उसकी अभी तक काटी गई 10 माह की सजा को काफी माना है और रिहा करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि दंड का उद्देश्य केवल पीड़ा देना नहीं, बल्कि अपराधी को उसके कृत्य के परिणामों का अहसास कराना और उसे समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर देना भी है।
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अभियोजन के अनुसार 19-20 मई 2007 की रात जालंधर से लुधियाना की ओर जा रहे एक परिवार की कार जीटी रोड, फिल्लौर के पास एक ट्रक से टकरा गई। आरोप था कि ट्रक चालक ओम प्रकाश ने वाहन को लापरवाही से सड़क के बीचोबीच खड़ा कर दिया था। इस टक्कर में अमनदीप सिंह उर्फ राजा की मौके पर ही मौत हो गई जबकि उनकी बहन मनप्रीत कौर गंभीर रूप से घायल हुईं और बाद में उन्होंने भी दम तोड़ दिया।
पुलिस ने ओम प्रकाश के खिलाफ मामला दर्ज किया। ट्रायल के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, फिल्लौर ने उसे दोषी ठहराते हुए दो साल की कठोर कैद और 1000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। यह फैसला अपीलीय अदालत द्वारा भी बरकरार रखा गया।
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हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका के दौरान ओम प्रकाश ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी बल्कि केवल सजा की अवधि पर राहत मांगी। बचाव पक्ष ने दलील दी कि घटना एक दुर्घटना थी, इसमें कोई आपराधिक मंशा नहीं थी और आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकाॅर्ड भी नहीं है। साथ ही यह भी रेखांकित किया गया कि आरोपी 18 साल से मुकदमे का मानसिक और सामाजिक बोझ झेल रहा है तथा दो साल की सजा में से करीब 10 महीने पहले ही काट चुका है। हुए हाईकोर्ट ने दो साल की कैद की सजा को घटाकर अब तक भुगती गई सजा तक सीमित कर दिया और जुर्माने की राशि 1000 बढ़ाकर 3,000 रुपये कर दी।
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