पीजीआई चंडीगढ़ के निदेशक प्रोफेसर जगत राम
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फगवाड़ा निवासी कोरोना पॉजिटिव छह माह की बच्ची की मौत के बाद पीजीआई प्रशासन के कोरोना से बचाव की तैयारियों पर सवाल उठने लगे हैं। इसके बचाव में पीजीआई डायरेक्टर प्रो. जगतराम का कहना है कि बच्ची पीजीआई में भर्ती होने से पहले ही कोरोना पॉजिटिव थी क्योंकि अगर वह पीजीआई में आने के बाद संक्रमित हुई होती तो पीजीआई के क्वारंटीन किए गए 54 स्टाफ में से किसी न किसी की रिपोर्ट पॉजिटिव आती। क्योंकि बच्ची और क्वारंटीन किए गए डॉक्टरों ओर अन्य स्टाफ एक दूसरे के संपर्क में समान रूप से थे।
उन्होंने बताया कि पीजीआई स्टाफ की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ऑपरेशन थियेटर की टीम को पीपीई किट पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। वहीं, प्रो. जगतराम ने बच्ची के इलाज के दौरान की गई अनदेखी को भारी चूक मानते हुए बताया कि अब पीजीआई आने वाले ऐसे सभी गंभीर मामलों में कोरोना टेस्ट अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही अन्य राज्यों के प्रमुख सचिवों से भी इस संबंध में बातचीत की गई है कि वे रेफर मामलों में कोरोना का टेस्ट अनिवार्य कर दें।
बच्ची शुरू से वेंटिलेटर पर थी, इसलिए बच गया पीजीआई स्टाफ
प्रो. जगतराम ने बताया कि बच्ची बेहद गंभीर स्थिति में पीजीआई लाई गई थी। उसे शुरू से ही वेंटिलेटर पर रखा गया था। इसके कारण उसका मुंह और नाक पूरी तरह कवर था। ऑक्सीजन मास्क के साथ उसके मुंह व नाक में ट्यूब भी डाली गई थी। इसके कारण वायरस का संचार हवा में नहीं हुआ। इससे पीजीआई के डॉक्टर व स्टाफ संक्रमित होने से बच गया।
अब हर रोज होंगे 150 कोरोना टेस्ट
प्रो. जगतराम ने बताया कि पीजीआई में प्रतिदिन 600 से 700 मरीज आ रहे हैं। उन सभी का कोरोना टेस्ट एक समय मे हो पाना संभव नहीं है। अब तक 80 से 90 टेस्ट प्रतिदिन हो रहे थे। इसकी संख्या बढ़कर 150 कर दी गई है। इससे अब ज्यादा से ज्यादा संदिग्ध मरीजों को प्रारंभिक स्तर पर ही कोरोना होने या न होने का पता लगाया जा सकेगा।