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बार-बार अवज्ञा जज के लिए अशोभनीय, नियमित हुआ तो बाकी जजों के बीच जाएगा गलत संदेश: हाईकोर्ट

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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रोबेशन पर रहते हुए बार-बार अवज्ञा के दोषी जज की सेवा समाप्त करने के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि बार-बार अवज्ञा एक न्यायिक अधिकारी के लिए अशोभनीय है। प्रोबेशन अवधि के दौरान बार-बार अवज्ञा करने वाला यदि नियमित होने के बाद भी अनुचित व्यवहार जारी रखेगा तो अन्य न्यायिक अधिकारियों के लिए एक बुरा उदाहरण स्थापित करेगा।
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याचिका दाखिल करते हुए अभिनव किरण सेखों ने हाईकोर्ट को बताया कि उसने 2015 में पीसीएस ज्यूडिशियल परीक्षा पास की थी और ट्रेनिंग के बाद उसे विभिन्न स्थानों पर नियुक्ति दी गई। प्रोबेशन की अवधि दो वर्ष होती है और इसे अधिकतम 3 साल तक किया जा सकता है। उनकी नियुक्ति 8 मार्च 2016 को हुई थी और ऐसे में तीन वर्ष पूरा होने पर उन्हें नियमित किया जाना चाहिए था। ऐसा न करके फुल बेंच ने उनकी सेवा समाप्त करने के लिए दिसंबर 2020 में पंजाब सरकार को सिफारिश की थी और अप्रैल 2021 में इसे मंजूर कर लिया गया। याची ने बताया कि उसके खिलाफ तय प्रक्रिया का पालन किए बगैर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर इस मामले में दलील रखते हुए कहा कि याची ने पटियाला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश के अधीन कार्य करते हुए 23 व 24 अक्तूबर 2019 को क्रमशः: 2 और 1 केस ही सुनवाई के लिए रखे थे। तब पटियाला के प्रशासनिक जज ने इस पर गौर किया और बाद में इस कड़ी में पता चला कि याची के भारत से बाहर दौरे का आवेदन हाईकोर्ट के रद्द करने के बावजूद वह विदेश यात्रा कर आया। जब उससे पासपोर्ट व अन्य दस्तावेज मांगे गए तो उसने तथ्य छिपाए।
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सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि प्रोबेशन की अधिकतम समय सीमा पूरी होने का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी नियमित होने के पत्र के अभाव में भी नियमित हो जाए। याची का अवज्ञा वाला रवैया न्यायिक अधिकारी के लिए अशोभनीय है और यदि उसे नियमित किया गया और बाद में भी ऐसा जारी रहा तो बाकी के लिए गलत उदाहरण पेश करेगा। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए उसकी सेवा समाप्ति के आदेश पर मुहर लगा दी है।
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