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पुटा की सदस्यता घटी, कई रहे कारण

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पंजाब यूनिवर्सिटी टीचर एसोसिएशन (पुटा) दो हिस्सों में विभाजित हो गई। उन्होंने सदस्यता लेने से इनकार कर दिया। जानकारों का कहना है कि पुटा इससे कमजोर होगी। पुटा के पदाधिकारियों को उन्हें मनाने की कोशिश करनी चाहिए थी। अभी भी जानकारों ने सलाह दी है कि मंगलवार से पहले डेंटल कॉलेज शिक्षकों को मनाया जाए ताकि वह मेंबर बनें और पुटा को मजबूती मिल सके। अन्यथा हर बार कोई न कोई विभाग डेंटल कॉलेज की तरह अलग होता जाएगा। उनकी नाराजगी जायज है, लेकिन उनका साथ सभी को मिलकर देना चाहिए।
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आंकड़ों को देखें तो इस बार 709 शिक्षकों को पुटा की सदस्यता लेनी थी। उसकी सूची बनाई गई थी। इन शिक्षकों के पास पुटा की टीम पहुंची और सदस्यता शुल्क लिया। अब तक 624 शिक्षकों ने सदस्यता ली है। पिछले साल सदस्यों की संख्या 689 थी। जानकारों का कहना है कि एक तो शिक्षकों में इस बार का आक्रोश रहा कि सदस्यता शुल्क बढ़ाकर 500 रुपये कर दिया गया और दूसरा सैलरी से शुल्क काटे जाने के लिए कह दिया गया है। हालांकि, बाद में पीयू ने इसके लिए कानूनी राय ली तो पुटा को मैनुअल मेंबरशिप के लिए टीम लगानी पड़ी। यह भी बताया जा रहा है कि कई शिक्षकों ने पुटा से बैंक खातों की स्थिति और एफडीआर की जानकारी मांगी थी, लेकिन उन्होंने नहीं दी। इससे भी शिक्षकों में नाराजगी है। अब देखना है कि पुटा में किस गुट का बहुमत सिद्घ होता है।
डेंटल कॉलेज शिक्षकों को न मनाना पुटा की विफलता
डेंटल कॉलेज के 50 से अधिक शिक्षकों का मेंबरशिप न लेना और अलग हो जाना, अपने में सोचनीय है। आखिर इतना बड़ा शिक्षकों का वर्ग अलग हो गया और किसी पदाधिकारी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। उन्हें मनाने की कोशिश क्यों नहीं की गई। इस पर सवाल पर सवाल उठ रहे हैं। कुछेक ने फोन कर जरूर पूछा, लेकिन उनके कार्यालय में जाने कि हिम्मत नहीं दिखाई। जानकारों का कहना है कि पुटा खुद ही नहीं चाहती कि वह मेंबर बनें। बताया जा रहा है कि यदि उन्हें मेंबर बनाया जाता तो चुनाव में खड़े होने वाले कुछ उम्मीदवारों को उसका लाभ नहीं मिलता। दूसरे पक्ष उनके वोट ले जाते। इसके कारण कुछ प्रयास नहीं किए गए। कुल मिलाकर डेंटल कॉलेज शिक्षकों के दूर जाने से पुटा की विफलता सामने आई है।
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इस बार त्रिकोणीय मुकाबला
इस बार पुटा चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबला बताया जा रहा है। वर्तमान अध्यक्ष प्रो. राजेश गिल फिर से चुनावी मैदान में आने की तैयारी में हैं। वहीं, पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व एसवीसी प्रो. देविंदर सिंह व प्रो. एमसी सिद्धू का पक्ष भी चुनावी मैदान में उतर रहे हैं। सभी अपनी-अपनी तैयारी में लगे हैं। कोई किसी से कमजोर नहीं है। वहीं, राजनीतिक पंडित चाहते हैं कि यह त्रिकोणीय मुकाबला न होकर द्विकोणीय रहे, इसके लिए राजनीतिक लोग लगे हुए हैं।
लाइब्रेरियन फिर बने सदस्य
शिक्षकों का कहना है कि लाइब्रेरियन व प्रोग्रामर्स को फिर से मेंबर बनाया गया है, जबकि लाइब्रेरियन कई लाइब्रेरी संगठनों से जुड़े हैं। जानकारों का कहना है कि पुटा को मेंबरशिप तभी देनी चाहिए थी, जब ये लोग किसी अन्य संगठन से न जुड़े होते, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। इसको लेकर शिक्षकों में रोष है। अब देखना है कि यह गुस्सा वोट में कैसे बदलता है और किस पक्ष में जाता है।
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