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IDFC First Bank Scam: सीबीआई चार्जशीट में घोटाले का काला चिट्ठा, फर्जी खाते; बदले गए मोबाइल-ईमेल

Fri, 10 Jul 2026 11:51 AM IST
Nivedita न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पंचकूला

सार

जांच एजेंसी के मुताबिक केवल आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के माध्यम से ही 722 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध वित्तीय लेन-देन सामने आए हैं। इनमें बड़ी राशि सरकारी विभागों से जुड़ी है।
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आईडीएफसी बैंक - फोटो : फाइल
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विस्तार
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हरियाणा के सरकारी खजाने में हुए 590 करोड़ रुपये के बहुचर्चित बैंक घोटाले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की चार्जशीट ने उस संगठित नेटवर्क का पर्दाफाश किया है, जिसमें सरकारी विभागों के अधिकारी, निजी बैंक के कर्मचारी और फर्जी कंपनियों के संचालक कथित तौर पर एक ही साजिश का हिस्सा बनकर जनता के करोड़ों रुपये ठिकाने लगाते रहे। 

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पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत में दाखिल चार्जशीट के अनुसार यह मामला महज वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि बैंकिंग सुरक्षा, सरकारी वित्तीय नियंत्रण और साइबर सिस्टम को दरकिनार कर रची गई सुनियोजित आपराधिक साजिश है।

जांच एजेंसी ने 15 आरोपियों को नामजद किया है। इनमें आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक रिभव ऋषि, सीनियर रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार, बैंक ऑथराइजर सीमा धीमन समेत अन्य बैंक अधिकारी, हरियाणा पावर जनरेशन कॉर्पोरेशन के तत्कालीन निदेशक (वित्त) अमित दीवान, हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के वित्त नियंत्रक रणधीर सिंह, पंचायत विभाग के अधीक्षक नरेश कुमार तथा अभिषेक सिंगला, स्वाति सिंगला और अंकुर शर्मा जैसे निजी कंपनियों के संचालक शामिल हैं।
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722 करोड़ से अधिक संदिग्ध लेन-देन की जांच
जांच एजेंसी के मुताबिक केवल आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के माध्यम से ही 722 करोड़ रुपये से अधिक के संदिग्ध वित्तीय लेन-देन सामने आए हैं। इनमें बड़ी राशि सरकारी विभागों से जुड़ी है। शुरुआती खुलासा पंचायत विभाग की आंतरिक ऑडिट के दौरान बैंक खातों के मिलान में सामने आई भारी विसंगतियों से हुआ था।

किस विभाग से कब और कितना निकला पैसा
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के माध्यम से हुई धोखाधड़ी में सबसे अधिक प्रभावित विभाग हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद रहा, जिसके 101 डेबिट लेन-देन के जरिए 1,82,93,82,811 रुपये निकाले गए। इसके अतिरिक्त हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के विभिन्न खातों से 49 लेन-देन के माध्यम से कुल 1,92,49,05,598 रुपये की निकासी दर्ज की गई।

नगर निगम पंचकूला के 22 लेन-देन में 1,00,00,00,000 रुपये और निदेशक पंचायत (एमएमजीएवाई 2.0) के 16 लेन-देन में 89,23,69,652 रुपये का गबन किया गया। अन्य प्रभावित विभागों में एचपीजीसीएल कर्मचारी पेंशन फंड ट्रस्ट, एचपीजीसीएल ड्राई फ्लाई ऐश फंड, नगर परिषद कालका, वेलफेयर कमीशन हरियाणा और हरियाणा मार्केटिंग डेवलपमेंट फंड शामिल हैं, जिनसे करोड़ों रुपये की अवैध निकासी की गई।

आईडीएफसी बैंक के कुल 221 डेबिट लेन-देन के जरिए 7,22,35,73,539.76 रुपये का गबन किया गया। इसके अलावा एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के माध्यम से भी अनियमितताएं सामने आईं। इसमें निदेशक पंचायत (एमएमजीएवाई 2.0) के खाते से 14 लेन-देन में 71,61,14,910 रुपये और एचपीजीसीएल कर्मचारी पेंशन फंड ट्रस्ट के खाते से 25,00,00,000 रुपये निकाले गए। इस प्रकार एयू बैंक से कुल 15 लेन-देन में 96,61,14,910 रुपये की अवैध निकासी हुई।

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फर्जी खाते खोलकर सरकारी खजाने में सेंध
सीबीआई के अनुसार आरोपियों ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक की चंडीगढ़ और पंचकूला शाखाओं में सरकारी विभागों के नाम पर फर्जी बैंक खाते खुलवाए। बैंक अधिकारियों ने अनिवार्य केवाईसी प्रक्रिया और सत्यापन नियमों की अनदेखी करते हुए इन खातों को मंजूरी दी।

इसके बाद पंचायत विभाग, एचपीजीसीएल और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद जैसे संवेदनशील विभागों का सरकारी धन इन खातों में ट्रांसफर किया गया और फिर फर्जी डेबिट नोट, जाली हस्ताक्षरों तथा अन्य दस्तावेजों के जरिए राशि को स्वस्तिक देश प्रोजेक्ट्स और एसआरआर प्लानिंग गुरुस प्राइवेट लिमिटेड जैसी कथित शेल कंपनियों के खातों में भेज दिया गया।

गलती नहीं, आपराधिक सहमति का मामला
चार्जशीट में दर्ज एक तथ्य ने जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया। पंचायत विभाग के एक चेक में शब्दों में 25 करोड़ रुपये लिखा था, जबकि अंकों में अलग राशि दर्ज थी। बैंकिंग नियमों के मुताबिक ऐसे चेक का भुगतान रोककर सत्यापन करना अनिवार्य होता है, लेकिन बैंक अधिकारियों ने बिना किसी पुष्टि के भुगतान कर दिया। सीबीआई का मानना है कि यह सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित आपराधिक मिलीभगत का संकेत है।

मोबाइल-ईमेल बदलकर दबाए गए ट्रांजेक्शन अलर्ट
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने सरकारी विभागों के अधिकृत मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी बैंक रिकॉर्ड से हटवाकर अपने नियंत्रण वाले नंबर और ईमेल अपडेट करा दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि करोड़ों रुपये के लेन-देन के बावजूद संबंधित विभागों को न तो बैंक अलर्ट मिले और न ही स्टेटमेंट की जानकारी मिली। सीबीआई ने इसे सुनियोजित साइबर धोखाधड़ी का हिस्सा माना है।

केवाईसी तोड़ा, शेल कंपनियों को मिला संरक्षण
चार्जशीट के मुताबिक कथित शेल कंपनियों का कोई वास्तविक कारोबारी आधार नहीं मिला। इनका इस्तेमाल केवल सरकारी धन को डायवर्ट करने के लिए किया गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि बैंक अधिकारियों ने केवाईसी और जोखिम मूल्यांकन प्रक्रियाओं का उल्लंघन करते हुए इन खातों को विशेष सुविधा दी, जिससे सामान्य ऑडिट और निगरानी तंत्र भी सक्रिय नहीं हो सका।

लेयरिंग से छिपाया गया मनी ट्रेल
सीबीआई ने चार्जशीट में कहा है कि सरकारी खातों से पैसा निकलने के तुरंत बाद उसे कई खातों में छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर भेजा गया। इस लेयरिंग तकनीक का उद्देश्य धन के मूल स्रोत और अंतिम लाभार्थियों तक जांच एजेंसियों की पहुंच को कठिन बनाना था। डिजिटल ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड और बैंकिंग डेटा के आधार पर अब पूरे मनी ट्रेल की जांच की जा रही है।

डिलीट डेटा भी हुआ रिकवर
जांच के दौरान सीबीआई ने कई लैपटॉप, मोबाइल फोन, हार्ड डिस्क और डीवीआर जब्त किए। आरोप है कि कुछ आरोपियों ने इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मिटाने की कोशिश भी की, लेकिन डिजिटल फोरेंसिक जांच के जरिए डिलीट की गई फाइलें और ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड रिकवर कर लिए गए। इन्हें चार्जशीट का महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य बनाया गया है।

सरकारी अनुमति के बिना निकलता रहा पैसा
चार्जशीट में यह भी उल्लेख है कि करोड़ों रुपये के इन ट्रांजेक्शनों के लिए सक्षम सरकारी प्राधिकारी से न तो डिजिटल स्वीकृति ली गई और न ही वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया। सीबीआई के अनुसार इससे संबंधित सरकारी अधिकारियों की भूमिका और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
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