चंडीगढ़। पुलिस सुरक्षा की मांग महज स्टेटस सिंबल के रूप में नहीं की जा सकती, बल्कि हर अनुरोध को राज्य की सुरक्षा मूल्यांकन नीति के तहत जरूरत और खतरे की कसौटी पर खरा उतरना होगा। याचिकाकर्ता ने खतरे का हवाला देते हुए पुलिस सुरक्षा की मांग की थी और सुरक्षा समीक्षा के लिए 2 लाख रुपये जमानत के तौर पर जमा करवाए थे।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने न केवल संजय मल्होत्रा की याचिका को निराधार बताते हुए खारिज किया, बल्कि पहले से जमा कराए गए दो लाख की राशि को भी जब्त करने के निर्देश दिए। यह राशि अब जालंधर की जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को ट्रांसफर की जाएगी। हाईकोर्ट ने कहा कि एक ऐसी व्यवस्था में जहां समानता को महत्व दिया जाता है, वहां पुलिस जैसे सार्वजनिक संसाधनों तक पहुंच आवश्यकता और जोखिम के आधार पर ही दी जानी चाहिए।
पुलिस एक पेशेवर बल है, जिसे करदाताओं के पैसे से प्रशिक्षित और संचालित किया जाता है ताकि नागरिकों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके। बार-बार फर्जी या मनगढ़ंत खतरों की जांच में राज्य संसाधनों का दुरुपयोग करना न केवल अपव्यय है, बल्कि गंभीर चिंता का विषय भी है।
याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत खतरे की धारणा की जांच राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों जैसे कि अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (सुरक्षा), राज्य खुफिया विभाग और अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त की ओर से की गई थी। सभी रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकला कि याचिकाकर्ता या उसके परिवार को कोई वास्तविक खतरा नहीं है। कोर्ट को बताया गया कि खतरे की सत्यता की जांच के लिए एक अधिकारी को नियुक्त किया गया था, लेकिन याचिकाकर्ता ने न तो जांच में सहयोग किया और न ही सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध कराए। इसके बजाय, उसने 15 मई को एक बयान जारी कर जांच अधिकारी पर पक्षपात के निराधार आरोप लगाते हुए जांच को ट्रांसफर करने की मांग कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि याचिकाकर्ता इस भ्रांति में है कि वह मनमाफिक तरीके से कानून व्यवस्था एजेंसियों को संचालित कर सकता है। याची ने खुद को कुख्यात गैंगस्टरों और आतंकवादी संगठनों का निशाना बताने की कोशिश, जबकि कोई पुष्ट सामग्री उपलब्ध नहीं थी यह सिर्फ मामला सनसनीखेज बनाने की मंशा को दर्शाता है।