चंडीगढ़। जीएमसीएच-32 में एमडी, एमएस प्रवेश प्रक्रिया में किए गए बदलाव को चुनौती देने वाली याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने वीरवार को सुनवाई करते हुए यूटी प्रशासन सहित अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। प्रवेश के लिए काउंसिल 16 अगस्त को होनी है। ऐसे में याची पक्ष ने इस पर रोक की मांग की थी। हाईकोर्ट ने काउंसलिंग पर रोक लगाने से फिलहाल इन्कार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का मांगपत्र फिलहाल विचाराधीन है ऐसे में इस पर निर्णय लिया जा सकता है। याचिका दाखिल करते हुए शुभम व अन्य ने हाईकोर्ट को बताया कि जीएमसीएच में एमडी व एमएस की सीटों पर दाखिले के लिए दो कोटा होते हैं। पहला कोटा संस्थान का होता है और दूसरा कोटा स्टेट पूल का होता है। संस्थान कोटा में जीएमसीएच से एमबीबीएस करने वालों को स्थान दिया जाता है तो वहीं चंडीगढ़ पूल में स्थानीय निवासियों को स्थान दिया जाता है चाहे उन्होंने एमबीबीएस कहीं से भी की हो। दोनों पूल का कोटा 50 प्रतिशत सीटों का होता है। अभी तक की व्यवस्था के तहत पहले यूटी पूल की 50 प्रतिशत सीटों को भरा जाता है और बाद में संस्थान कोटा की 50 प्रतिशत। जीएमसीएच-32 से एमबीबीएस करने वाले 5 साल तक चंडीगढ़ में रहने के चलते संस्थान कोटा के लिए भी पात्र होते थे और यूटी पूल के लिए भी।
याचिकाकर्ता ने बताया कि इस बार स्वास्थ्य सचिव ने इस व्यवस्था में परिवर्तन कर दिया है और इसके तहत जीएमसीएच-32 से एमबीबीएस करने वालों के लिए पहले संस्थान कोटा की 50 प्रतिशत सीटों के लिए आवेदन करने का प्रावधान किया गया है। इसमें सीट न पाने की स्थिति में ही वे यूटी पूल की सीट के लिए आवेदन कर सकते हैं। याची ने कहा कि इस व्यवस्था से जीएमसीएच 32 से एमबीबीएस करने वाले विद्यार्थियों को नुकसान होगा क्योंकि शहर में केवल एक ही मेडिकल कॉलेज है और उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं होगा। प्रशासन चाहता है कि जीएमसीएच के टॉपर विद्यार्थियों को संस्थान कोटा में ही स्थान दिया जाए ताकि स्टेट पूल की सीटों को बाहरी राज्यों से एमबीबीएस करने वाले चंडीगढ़ के निवासियों से भरा जा सके।
याची ने कहा कि इस बारे में यूटी प्रशासक बनवारीलाल पुरोहित को भी ज्ञापन सौंपा जा चुका है। बीते 7 अगस्त को सलाहकार धर्मपाल से भी वार्ता का समय मांगा गया था लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उधर, स्वास्थ्य सचिव यशपाल गर्ग से भी इस मुद्दे पर बात करने का प्रयास किया, लेकिन कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। इसके बाद अदालत का सहारा लेना पड़ा।