चंडीगढ़। एक लड़की के अपहरण के दोषी करार दिए गए दलबीर और बिशन को 20 साल बाद इंसाफ मिला है। हाईकोर्ट ने दोनों को दोषमुक्त करार देते हुए कहा कि पुलिस ने केस साबित करने के लिए झूठी कहानी गढ़ी व ट्रायल कोर्ट ने भी इस मामले में गंभीरता नहीं दिखाई और सजा सुना दी।
मामला 2001 का है जब सोनीपत निवासी एक 14 साल की लड़की ने पुलिस को शिकायत दी थी कि दो युवकों ने उसे अगवा किया और उसके साथ गलत करने की कोशिश की, लेकिन शोर मचाने पर वह भाग गए। इस मामले में 7 जुलाई 2001 को पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और 11 अगस्त 2004 को सोनीपत फास्ट ट्रैक कोर्ट ने दलबीर और बिशन को 2 साल की सजा सुना दी। इस सजा को चुनौती देते हुए दोनों ने 2004 में हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। 4 साल ट्रायल कोर्ट में तथा 16 साल हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार हाईकोर्ट सेे अब उन्हें इंसाफ मिला और उन्हें बरी कर दिया गया।
-कोर्ट की टिप्पणी- महिलाओं के प्रति अपराध मामले सुनते हुए संवेदना बरतें, लेकिन न्यायशास्त्र का स्वर्ण सिद्घांत न भूलें
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि यहां अभियोजन पक्ष की कहानी शुरू से ही कमजोर रही है। पीड़िता लड़कों के साथ जाते हुए जरा भी नहीं चिल्लाई, पीड़िता के अनुसार उससे कुछ गलत नहीं हुआ तो उसके अंतरवस्त्रों पर सीमन कैसे मिला। पुलिस ने दोबारा जांच निजी डॉक्टर से क्यों करवाई। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इन पक्षों पर गौर ही नहीं किया। भले ही मामला महिला के प्रति अपराध का है, लेकिन अदालतों को इन मामलों में संवेदनशील होने के साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपराध न्यायशास्त्र का स्वर्ण सिद्घांत न टूटे।
यह है अपराध न्यायशास्त्र का स्वर्ण सिद्घांत:
अपराध न्यायशास्त्र के स्वर्ण सिद्घांत के अनुसार दोषी को स्वयं को निर्दोष साबित करने से अहम यह होता हे कि अभियोजन पक्ष आरोपी पर अपराध साबित करे। अपराध साबित करते हुए इसे किसी भी तरह के शक से ऊपर होना बहुत जरूरी है।