कालका की सिविल कोर्ट ने अंतरदेशीय (इंटर-कंट्री) गोद लेने से जुड़े एक अहम मामले में वर्ष 2018 में पंजीकृत गोदनामा (एडॉप्शन डीड) को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आठ वर्षीय बच्ची कानूनी रूप से अपने जैविक माता-पिता की ही संतान रहेगी और न्यूजीलैंड में रहने वाले कथित दत्तक दंपती का उस पर कोई वैधानिक अधिकार नहीं होगा।
मामला तब सामने आया जब कालका निवासी एक महिला ने अपनी नाबालिग बेटी के कथित फर्जी गोदनामे को चुनौती देते हुए अदालत में याचिका दायर की। महिला ने अदालत को बताया कि वर्ष 2018 में उनसे कुछ दस्तावेजों पर यह कहकर हस्ताक्षर कराए गए थे कि बच्ची को न्यूजीलैंड में बेहतर शिक्षा दिलाने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। उन्हें यह नहीं बताया गया कि दस्तावेज गोद लेने से संबंधित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि गोद लेने की कोई धार्मिक या सामाजिक रस्म नहीं हुई और बच्ची हमेशा उनके साथ ही रही।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विदेशी नागरिकों से जुड़े रिश्तेदारी पर आधारित गोद लेने के मामलों में सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) के नियमों और एडॉप्शन रेगुलेशन-2017 का पालन अनिवार्य है। मामले में न तो कारा, न जिला बाल संरक्षण इकाई और न ही किसी सक्षम न्यायालय से आवश्यक अनुमति ली गई थी।
अदालत ने संज्ञान लिया कि न्यूजीलैंड की बाल कल्याण एजेंसी ने मार्च 2022 में इस गोद लेने की प्रक्रिया को अस्वीकार कर दिया था। एजेंसी की रिपोर्ट में दंपती की परिस्थितियों को बच्ची के पालन-पोषण के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था।
सभी साक्ष्यों, गवाहों के बयान, प्रशासनिक रिपोर्ट और दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि है। चूंकि गोद लेने की अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया इसलिए वर्ष 2018 का गोदनामा निरस्त करते हुए बच्ची के सभी कानूनी अधिकार उसके जैविक माता-पिता के पक्ष में बहाल कर दिए गए।