चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि लापरवाही से मौत के मामलों में दर्ज एफआईआर को समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में असली पीड़ित मृतक होता है न कि एफआईआर दर्ज कराने वाला या उसके परिजन। परिजनों द्वारा दिया गया समझौता कानूनी तौर पर मान्य नहीं हो सकता।
जस्टिस सुमित गोयल ने कहा कि समझौते का पूरा सिद्धांत पीड़ित की स्वैच्छिक सहमति पर आधारित होता है लेकिन मौत के मामलों में मृतक अपनी सहमति दे ही नहीं सकता इसलिए यह आधार शुरू से ही असंभव है। यह फैसला उस मामले में आया जिसमें जून 2022 की एफआईआर और मोगा की अदालत द्वारा 4 अप्रैल 2024 को सुनाई गई सजा को रद्द करने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता ने बताया था कि वह शिकायतकर्ता के साथ समझौता कर चुका है लेकिन हाईकोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता या मृतक के परिजन वास्तविक पीड़ित नहीं हैं और वे मृतक की ओर से किसी समझौते का अधिकार नहीं रखते। जस्टिस गोयल ने स्पष्ट कहा कि मौत जैसे अपरिवर्तनीय नुकसान वाले मामलों में समझौता न केवल कानूनी रूप से कमजोर है, बल्कि समाज के हितों के भी खिलाफ है।
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यदि ऐसे मामलों में समझौते के नाम पर एफआईआर रद्द होने लगें तो यह कानून के शासन को कमजोर करेगा और गंभीर अपराध की गंभीरता को तुच्छ बना देगा। सुनवाई के अंत में अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में समझौते का कोई स्थान नहीं है क्योंकि मृतक ही असली पीड़ित है। उसकी आवाज कानूनी रूप से कभी सहमति नहीं दे सकती।