चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारी को आपराधिक और विभागीय जांच में निर्दोष पाए जाने के बावजूद उसे वेतन से वंचित रखना घोर अन्याय है। हाईकोर्ट ने लुधियाना नगर निगम के क्लर्क को बकाया वेतन से इन्कार करने के आदेश को रद्द कर दिया है।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपने फैसले में कहा कि जब कर्मचारी को आपराधिक मुकदमे और सभी विभागीय जांच में क्लीन चिट मिल चुकी हो तब वेतन रोकना कानूनन दंड देने जैसा है, जो स्वीकार्य नहीं है। किसी भी प्रशासनिक निर्णय के पीछे ठोस कारण होना अनिवार्य है अन्यथा वह मनमाना माना जाएगा।
क्लर्क अत्तर सिंह को 6 दिसंबर 2000 को एक एफआईआर के बाद निलंबित कर दिया गया था। उन पर ठेकेदार के साथ मिलकर रिकाॅर्ड में हेरफेर का आरोप था। लुधियाना की ट्रायल कोर्ट ने अक्तूबर 2010 में सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया। इसके बावजूद उन्हें जुलाई 2011 में ही बहाल किया गया।
बरी होने के बाद भी उनके खिलाफ 2012, 2014 और 2016 में तीन अलग-अलग विभागीय जांचें कराई गईं। हर बार जांच अधिकारियों ने उन्हें निर्दोष पाया और अंतिम रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की गई कि निलंबन अवधि को ड्यूटी पीरियड माना जाए। इसके बावजूद अगस्त 2016 में नगर निगम आयुक्त ने आदेश जारी कर सेवा निरंतरता तो दे दी लेकिन वेतन देने से इन्कार कर दिया।
हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि 10 साल तक जांच लंबित रखना स्वयं प्रशासनिक लापरवाही है। बार-बार जांच के बावजूद जब हर रिपोर्ट कर्मचारी के पक्ष में रही तब भी वेतन रोकना मनमानी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।