अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि गैर-पारिवारिक स्टेशन से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होने वाला केंद्र सरकार का कर्मचारी प्रत्येक ऐसे स्थानांतरण से तीन वर्ष तक रियायती किराए पर सरकारी आवास बनाए रखने का हकदार है। केंद्र ने दावा किया था कि आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी 10 अप्रैल, 2018 के ज्ञापन के अनुसार, तीन वर्ष की अवधि की गणना पहले स्थानांतरण की तिथि से की जानी थी।
जस्टिस अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने कहा कि केंद्र सरकार के सामान्य पूल आवासीय आवास नियम, 2017 या उसके बाद के कार्यालय ज्ञापनों में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तबादले को केवल पहली पोस्टिंग तक सीमित करता हो। अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी को गैर-पारिवारिक स्टेशन पर स्थानांतरित होने पर आवास बनाए रखने की अनुमति देने का उद्देश्य कर्मचारी के परिवार के कल्याण और स्थिरता को सुनिश्चित करना था। पीठ ने कहा कि गैर-पारिवारिक स्टेशनों पर अक्सर प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों, सुरक्षा चिंताओं या बुनियादी शैक्षिक और चिकित्सा सुविधाओं की कमी का सामना करना पड़ता है।
रक्षा मंत्रालय के चंडीगढ़ जोन के मुख्य अभियंता के कार्यालय में संयुक्त निदेशक (अनुबंध) के रूप में काम करने वाले प्रतिवादी पर दंडात्मक किराया लगाने को रद्द करने के कैट के आदेश को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। उन्हें पहली बार 2015 में लेह स्थानांतरित किया गया था और फिर 2018 में उधमपुर में तैनात किया गया था – दोनों गैर-पारिवारिक स्टेशन थे। पीठ को बताया गया कि कर्मचारी ने दिसंबर 2020 तक अपना आवास बरकरार रखा। पीठ ने केंद्र की इस दलील को खारिज कर दिया कि कर्मचारी को 2018 में आवास खाली कर देना चाहिए था।