-सिविल अस्पताल का सरकारी डि-एडिक्शन सेंटर नशे के मरीजों से भरा, हर महीने आ रहे 40 से 45 नए मरीज
संवाद न्यूज एजेंसी
पंचकूला। जिले और आसपास के इलाकों में नशे की लत का कहर बढ़ता जा रहा है। इनमें 18 से 45 उम्र के बीच के युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग सबसे ज्यादा नशे के आदी हैं। खासतौर पर ओपिऑयड (हेरोइन, अफीम, सिंथेटिक ड्रग्स) की लत में डूबे हुए हैं। इन दिनों सिविल अस्पताल का सरकारी डि-एडिक्शन सेंटर नशे के मरीजों से भरा हुआ है।
आंकड़े बताते हैं कि 2022 में जहां 465 मरीज इलाज के लिए डि-एडिक्शन सेंटर में भर्ती हुए थे, वहीं 2023 में यह संख्या बढ़कर 533 हो गई। 2024 में भी लगभग इतने ही मरीज भर्ती हुए। इस साल के पहले तीन महीनों में ही 178 मरीज भर्ती हो चुके हैं। यानी हर महीने 40 से 45 नए मरीज आ रहे हैं।
100 में से लगभग 10 फीसदी मरीजों की हालत गंभीर
सिविल अस्पताल के सीनियर मेडिकल ऑफिसर व हेड ऑफ साइकेट्री डॉ. मनोज कुमार के मुताबिक ओपिऑयड की लत मुख्य रूप से 18 से 45 साल के लोगों को जकड़ रही है। उन्होंने बताया कि ओपीडी में आने वाले हर 100 मरीजों में से लगभग 10 फीसदी की हालत गंभीर होने पर तुरंत भर्ती करना पड़ता है।
60 प्रतिशत से ज्यादा मरीज हेराइन, अफीम और सिंथेटिक ड्रग्स के शिकार
सेंटर में भर्ती होने वाले मरीजों में 60 प्रतिशत से ज्यादा हेरोइन, अफीम और सिंथेटिक ड्रग्स के शिकार हैं। वहीं, 40 प्रतिशत लोग शराब की लत से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक नशे की शुरुआत में ही इलाज शुरू कर देने पर इलाज के सफल होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
महिलाओं में भी बढ़ रहा नशा
नशे के जाल में ज्यादातर मरीज पुरुष ही थे, लेकिन अब 5 फीसदी महिलाएं भी नशे की लत के इलाज के लिए सेंटर में आ रही हैं। यह संकेत है कि नशे का जाल अब महिलाओं तक भी फैल रहा है।
गरीब तबके पर ज्यादा असर
सेंटर के ज्यादातर मरीज पिंजौर, कालका, मौली गांव, राजीव कॉलोनी और पंचकूला-चंडीगढ़ के बाहरी इलाकों से आते हैं। डॉ. मनोज का कहना है कि आर्थिक तंगी और सामाजिक परिस्थितियां भी नशे की ओर धकेलने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।
इलाज कठिन, लेकिन जरूरी
डॉ. मनोज के अनुसार नशे से छुटकारा पाना लंबी और कठिन प्रक्रिया है। पहले डिटॉक्सिफिकेशन (शरीर से नशे को निकालना) किया जाता है, फिर मेंटेनेंस थेरेपी चलती है ताकि मरीज दोबारा नशे की गिरफ्त में न आएं। फिर भी 50-60 फीसदी मरीजों में दोबारा नशा करने की संभावना रहती है जो शराब के मरीजों (30-40 फीसदी) से काफी ज्यादा है।
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तीसरी बार भर्ती हुआ मर्चेंट नेवी अफसर
सेंटर में भर्ती एक 44 वर्षीय मर्चेंट नेवी अफसर चार महीने में तीसरी बार यहां आया है। वह गंभीर शराब की लत से जूझ रहा है। यह दिखाता है कि नशे से उबरना कितना मुश्किल है।
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युवा पीढ़ी पर संकट
हरियाणा में इस समय 30 सरकारी डि-एडिक्शन सेंटर हैं, जिनमें कुल 460 बेड हैं। इनके अलावा 130 प्राइवेट सेंटर और 26 सेवा-प्रबंधित काउंसलिंग-कम-रीहैबिलिटेशन सेंटर भी चल रहे हैं। पिछले पांच साल में पूरे राज्य में 18 से 30 साल के करीब 1.84 लाख युवाओं ने नशे के इलाज के लिए मदद मांगी है।