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शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद या गूंगी-बहरी दर्शक बनकर नहीं रह सकती अदालतें: हाईकोर्ट

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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में महिला की मौत के मामले में मुआवजा बढ़ाने की मांग करने वाले परिवार को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट कहा कि अदालत शुतुरमुर्ग की तरह आंखें बंद या गूंगी-बहरी दर्शक बनकर स्पष्ट असत्यता को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
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जस्टिस निधि गुप्ता की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए परिवार की अपील खारिज कर दी और मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण की ओर से दिए गए 3.61 लाख रुपये के मुआवजे को सही ठहराया। 62 साल की फिरोजपुर निवासी संत कौर की 7 मई 2020 को एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी।
एमएसीटी ने कार चालक की लापरवाही को दुर्घटना का कारण मानते हुए बीमा कंपनी को मुआवजा देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ मृतका के पति और बच्चों ने मुआवजा बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि दावा करने वाले पक्ष ने अलग-अलग मंचों पर विरोधाभासी बयान दिए हैं।
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अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल के सामने जहां दुर्घटना के लिए चालक को दोषी ठहराया गया वहीं आपराधिक मुकदमे के दौरान शिकायतकर्ता जोगा सिंह अपने ही बयान से मुकर गया और आरोपी चालक की पहचान तक नहीं कर पाया। अदालत ने इसे गंभीर विसंगति मानते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि मुआवजा प्राप्त करने के लिए ट्रिब्यूनल के समक्ष गलत बयान दिया गया।
कानून का मूल सिद्धांत है कि अपील में देरी के हर दिन का संतोषजनक स्पष्टीकरण होना चाहिए, जो इस मामले में नहीं दिया गया। इस आधार पर भी देरी माफ करने से इन्कार कर दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि मृतका की आय और उम्र को लेकर भी परिवार ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर पाया। ट्रिब्यूनल ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मृतका की उम्र 62 वर्ष मानी थी जबकि परिवार ने 55 वर्ष बताई थी।
इसी तरह आय को लेकर भी कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया। परिवार की ओर से दलील दी गई थी कि संत कौर आंगनबाड़ी में हेल्पर थीं और उनकी आय 6000 रुपये प्रतिमाह थी। साथ ही वे सिलाई और कृषि कार्य से भी अतिरिक्त आय अर्जित करती थीं। अदालत ने कहा कि इन दावों के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है।
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