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जमानत शर्तों में रियायत : अदालत ने घटाई मुचलके की रकम

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पंचकूला। जिला एवं सत्र न्यायाधीश वेद प्रकाश सिरोही की अदालत ने अहम फैसले में गरीब आरोपी को राहत देते हुए उसकी जमानत शर्तों में बड़ी रियायत दी है। अदालत ने कहा कि अत्यधिक और स्थानीय जमानती की मांग न केवल संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है बल्कि यह न्याय की मूल भावना के भी खिलाफ है। 2.35 लाख के दो स्थानीय जमानती प्रस्तुत न कर पाने के कारण आरोपी अब तक जेल में बंद था। अदालत ने आरोपी को 25,000 के निजी बांड और 25,000 के एक जमानती के साथ रिहा करने का आदेश दिया।
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मामला 16 मार्च 2025 का है जिसमें आरोपी पर थाना सेक्टर-5 में केस दर्ज हुआ था। आरोपी पर बीएनएस की धारा 303 और 317 (2) के तहत आरोप लगे थे। आरोपी को 2 अगस्त 2025 को जमानत मिल चुकी थी लेकिन वह जमानत की शर्तें पूरी न कर पाने के कारण जेल में बंद था।
अदालत ने इन मामलों का दिया हवाला


अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले अशोक संदीप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024) और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले सुमित शर्मा बनाम हरियाणा राज्य (2025) का हवाला देते हुए कहा कि जमानत राशि इतनी अधिक नहीं होनी चाहिए कि आरोपी के लिए इसे देना असंभव हो जाए। इस तरह की शर्तें न्याय के न्याय संगत नहीं हैं। साथ ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर चोट करती हैं। अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में यह स्पष्ट किया था कि स्थानीय जमानती की शर्त एक पुरानी और भेदभावपूर्ण परंपरा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
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अदालत की टिप्पणी और आदेश


मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर से लगाए गए भारी मुचलके को अत्याचारी, अव्यवहारिक और असंवैधानिक बताते हुए अदालत ने आदेश दिया कि आरोपी को 25,000 के निजी बांड और 25,000 के एक जमानती के साथ रिहा किया जाए।


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क्या कहता है कानून

बीएनएस, 2023 की धारा 484 (1) में स्पष्ट प्रावधान है कि हर जमानती बांड की राशि परिस्थितियों के अनुसार और वाजिब होनी चाहिए। उपधारा (2) के तहत उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय को यह अधिकार है कि वे पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा तय जमानत राशि को घटा सकते हैं।
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