चंडीगढ़। समय सीमा से जुड़ी मामूली चूक के आधार पर अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किए गए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के दो जवानों पर की गई कार्रवाई को अति कठोर निर्णय मानते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इतनी सख्त कार्रवाई करना असमानुपातिक है, खासकर जब जवानों का सेवा रिकॉर्ड बेहतर रहा हो।
गुरदासपुर निवासी याचिकाकर्ता श्रीकांत गौड़ा पाटिल (कर्नाटक) और चौधरी दशरथ भाई (गुजरात) को 20 नवंबर 2014 को बीएसएफ नियम के तहत अनुपयुक्तता के आधार पर जबरन रिटायर किया गया था। दोनों जवानों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तर्क दिया कि उनका सेवा रिकॉर्ड बेदाग था। पाटिल की पिछली पांच साल की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में चार बार बहुत अच्छा और एक बार अच्छा ग्रेड मिला। चौधरी दशरथ भाई को दो बार बहुत अच्छा और तीन बार अच्छा दर्जा मिला। उन पर लगाए गए आरोप, जैसे छुट्टी पर देरी से लौटना या अनुपस्थिति, मामूली प्रकृति के थे।
जस्टिस विनोद एस भारद्वाज की बेंच ने पाया कि बीएसएफ अधिकारियों ने अपनी ही प्रशासनिक गाइडलाइन का पालन नहीं किया। इनके अनुसार, अनिवार्य सेवानिवृत्ति से पहले जवानों के सेवा रिकॉर्ड का कम से कम तीन से चार वर्षों की अवधि में समग्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि तीन या अधिक प्रतिकूल प्रविष्टि होना सेवानिवृत्ति का आधार नहीं है, बल्कि यह केवल मूल्यांकन प्रक्रिया की शुरुआत का कारण हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का प्रदर्शन लगातार खराब नहीं था और न ही सुधार की संभावनाएं पूरी तरह खत्म हुई थीं। इस आधार पर 2014 में जारी सेवानिवृत्ति आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने मामले को संबंधित कमांडिंग ऑफिसर के पास भेजते हुए चार महीने के भीतर गाइडलाइन के अनुरूप नया आदेश पारित करने के निर्देश दिया है। साथ ही दोनों जवानों को 1 अक्तूबर 2025 को अपनी-अपनी बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर के सामने पेश होने को कहा गया है।