चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री या डिप्लोमा रखने वाले उम्मीदवार आर्किटेक्चर से संबंधित नौकरियों पर दावा नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि भर्ती के लिए योग्यता तय करना केवल नियोक्ता का अधिकार है न कि अदालत का।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने यह फैसला सुनाते हुए निपुण स्याल और अंकुर कुमार चौधरी द्वारा दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने पंजाब लोक सेवा आयोग की उस विज्ञप्ति को चुनौती दी थी, जिसमें 157 पदों के लिए बिल्डिंग इंस्पेक्टर (टेक्निकल) की भर्ती के लिए केवल आर्किटेक्चर या आर्किटेक्चरल असिस्टेंटशिप में डिप्लोमा/डिग्री की शर्त रखी गई थी।
विज्ञापन 17 जून 2022 को जारी हुआ था जिसमें पंजाबी भाषा (मैट्रिक स्तर) की योग्यता भी अनिवार्य थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सिविल इंजीनियरिंग में भी आर्किटेक्चर का अध्ययन होता है, इसलिए उन्हें भी पात्र माना जाए। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चर दो अलग-अलग क्षेत्र हैं।
सिविल इंजीनियरिंग में आर्किटेक्चर महज एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता है, जबकि आर्किटेक्चर कोर्स पूरी तरह इसी पर केंद्रित होता है। जस्टिस बराड़ ने कहा कि योग्यता की समानता तय करना अदालत का कार्यक्षेत्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के अपने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि न्यायिक पुनरीक्षण का काम यह तय करना नहीं है कि किसी विज्ञापन में निर्धारित योग्यता का दायरा बढ़ाया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करना अनुच्छेद 226 के तहत उसकी शक्तियों से परे होगा। यह नियोक्ता और विशेषज्ञों का विषय है। हाईकोर्ट ने याचिकाएं खारिज कर दी।