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संवाद, परवरिश की पाठशाला

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परवरिश की पाठशाला. 3
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अच्छा पालन-पोषण दूर, बच्चों को बना दिया ‘प्रोडक्ट’
- घर से शुरू होती है परवरिश की पाठशाला, अभिभावक अपनी जिम्मेदारी न भूलें
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
संवाद यानी सही राह ढूंढ़ने का प्रयास। बदलाव की बयार। संवाद होगा तो नए विचार आएंगे। विचारों से ही समाज समृद्ध बनेगा। सपने पूरे करने के नए तरीके आएंगे। अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में ऐसा ही हुआ। ‘परवरिश की पाठशाला’ सीरीज के तहत आए विशेषज्ञों ने अध्यापक-विद्यार्थी और अभिभावकों के बदल रहे रिश्तों को मजबूती देने के लिए अपने-अपने विचार रखे। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए संकल्पों से खत्म हो रहे नए रिश्तों के रोशनदान खुलेंगे।
इस संवाद के दौरान अलग-अलग पहलू सामने आए। प्रमुख रूप से कहा जाए तो जिंदगी में आगे निकलने की होड़ ने बच्च्चों को एक प्रोडक्ट बना दिया है। अभिभावक अच्छा पालन-पोषण देने की बजाय बच्चों को ऐसी रेस का हिस्सा बनाने में लगे हैं, जिसकी मंजिल पाने के जिद में काफी कुछ पीछे रह जाता है। अमर उजाला के संवाद में कई मुद्दे उठे, फिर चाहे एकल परिवार की बात हो, पैसा जमा करने की जल्दबाजी में बच्चों को समय न देना या फिर शिक्षकों की डांट पर उठने वाली उंगलियां।
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संवाद में एक बात उभरकर सामने आई कि बच्चों को संस्कार देने की पहली क्लास घर से शुरू होती है। स्कूल में इन संस्कारों को निखारा जा सकता है, लेकिन शुरुआत परिवार से होगी, तभी तराशने का काम बखूबी होगा। ऐसा नहीं कि कोई अभिभावक अपने बच्चों को खराब करना चाहता है, लेकिन बड़े जो हरकत करते हैं, बच्चे उसे जल्दी अपनाते हैं। बड़े लोग जो छोटी-छोटी गलतियां करते हैं, उन्हें बच्चे भी आगे चलकर अपनी आदतों में शुमार कर लेते हैं। फिर चाहे बच्चे के सामने माता-पिता का झगड़ा करना हो या ट्रैफिक सिग्नल तोड़ना। संवाद में भी सामने आया कि परवरिश की पाठशाला घर से शुरू होती है और स्कूल में उन्हें निखारकर, पढ़ाकर एक कामयाब इंसान बनाया जाता है।
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