सिटी में कला के महाकुंभ का आगाज
हरियाणा के राज्यपाल ने किया उद्घाटन, पहले दिन वीर राजा नाहर सिंह ने जीता दिल
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
एक ओर थर्मोकोल से बना लाल रंग का ड्रैगन और दूसरी ओर आसमां पर लहराती पतंगें। विजुअल आर्ट्स के कलाकारों की पेंटिंग्स और उसके साथ ही छोटी सी बेटी रहनुमा रानी की ओर से बनाई गईं पेंटिंग्स। असली रंग तो तब आता है, जब प्रवेश होता है हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी का। कला के इतने सारे रंग बिखरे हैं, चंडीगढ़ के बाल भवन सेक्टर-23 में। यह सारे रंग लेकर आया है, थिएटर फॉर थिएटर, जो मिनिस्ट्री आफ कल्चरल अफेयर्स के सहयोग से टीएफटी विंटर नेशनल थिएटर फेस्टिवल का आयोजन कर रहा है। यह फेस्टिवल 29 जनवरी से 27 फरवरी तक आयोजित किया जाएगा। नेशनल थिएटर फेस्टिवल का उद्घाटन हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने किया। उन्होंने यहां कला और कलाकारों की सराहना की।
रहनुमा रानी की कला को सलाम
टीएफटी विंटर नेशनल थिएटर फेस्टिवल में हरियाणा के राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी ने मौलीजागरां की रहने वाली रहनुमा रानी को स्वच्छ भारत पर तैयार की गईं पेंटिंग्स के लिए सम्मानित किया। रहनुमा रानी छठी क्लास की छात्रा है। वह अपने माता-पिता गुलनाज बानो और शफीक अहमद के साथ यहां आई थी। रहनुमा के शारीरिक कमजोरी को ताकत बनाने की कला के बारे में अमर उजाला ने प्रमुखता से छापा था। इसके बाद ही चंडीगढ़ प्रशासन को इस बच्ची का ख्याल आया और उसे ऐसे मौके पर बुलाकर सम्मान दिया गया।
विंटर थिएटर फेस्टिवल के पहले दिन अशोक लाल का लिखा और थिएटर फॉर थिएटर ग्रुप के सुदेश शर्मा की ओर से निर्देशित नाटक वीर राजा नाहर सिंह का मंचन किया गया। यह नाटक केंद्रित था वर्ष 1957 के विद्रोह पर। यह विद्रोह किया था बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह ने। जिन्होंने वास्तव में अंग्रेजों को सोचने और कड़े कदम उठाने पर मजबूर कर दिया था। यह नाटक राजा नाहर सिंह के जीवन उदय और हरियाणा राज्य का भारतीय स्वतंत्रता की लड़ाई में महत्व को दर्शाता है।
1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान भारत के सभी राज्यों में सांप्रदायिक संबंध बहुत संतुलित नहीं थे, परन्तु राजा नाहर सिंह और उनकी सेना ने अकेले ही ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ने का निश्चय कर लिया था। इस नाटक में एक नाटक से जुड़े सभी आवश्यक तत्व जैसे की कहानी, प्रकाश, संगीत, नृत्य, वेशभूषा और संवाद के साथ-साथ हरियाणवी लोक गीतों और स्क्रीन पर शक्तिशाली एवं सटीक प्रस्तुतियों के उपयोग से नाटक अधिक आकर्षक और प्रभावशाली प्रतीत होता है।
यह नाटक काफी हद तक वास्तविकता के साथ जोड़ता है और उस समय वापस ले जाता है, जब 1820 के दशक में बल्लभगढ़ के लोग अंग्रेजों के अधीन थे। राजा नाहर सिंह के ऐतिहासिक विद्रोह का आगाज हुआ। इस विद्रोह से घबरा कर ब्रिटिश राज्य ने राजा नाहर सिंह के विद्रोह को दबाने और उन्हें खत्म करने के लिए ब्रिटिश ऑफिसर और रेजिडेंट मैटो कॉफ को नियुक्त किया। उन्होंने राजा नाहर सिंह को खत्म करने की योजना बनाई। इन दोनों ब्रिटिश ऑफिसरों ने 1957 में राजा नाहर सिंह को पलवल के खजाने की डकैती के आरोप में गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया। अंत में विद्रोहियों को धन व सामग्री के साथ मदद करने और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध की साजिश व हाथियों के गैरकानूनी अधिग्रहण करने के अपराध में 2 जनवरी 1858 को दोषी करार दिया। अंत में राजा नाहर सिंह को 9 जनवरी, 1858 को दिल्ली के कोटली, चंडी चौक पर फांसी पर लटका दिया गया।
नाटक में कास्ट
नाहर सिंह-गुरप्रीत सिंह, रानी कपूरथला-नवजीत कौर, रानी मां-ग्रामीण औरत-मंदीप कौर, सूफी बाबा-सौरभ शर्मा, मामा-हरविंदर सिंह, सैनिक और ग्रामीण-भूपेंदर, प्रीत, तनु-जसपाल सिंह, नाहर सिंह-युवा-आशीष कुमार।
बैक स्टेज
सारंगी-विनोद पवार, सिंगर-मानिक गिल डफ-सुरेश कुमार, लाइट-गुरप्रीत सिंह गौरी, कास्ट्यूम-भूपिंदर कौर, मेकअप-नितिन।
मास्क बनाए युवाओं ने
टीएफटी के मनीष डोगरा, साजन, अमन, दीपक और आकाश ने इस फेस्टिवल के लिए खासतौर से मास्क तैयार किए थे। इसमें अलग-अलग प्रकार के शो के लिए अलग-अलग प्रकार के मास्क थे।
खूब हुई यहां पर पतंगबाजी
चंडीगढ़ सेक्टर-23 के बालभवन में खूब पतंगबाजी की गई। यहां पर आए आर्टिस्टों ने भी खूब पतंग उड़ाई। शाम करीब पांच बजे आर्टिस्ट पतंग उड़ाने में जुट गए थे।