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कम ही स्टूडेंट होते हैं, जो अध्यापकों की विरासत को संभाल कर रखते हैं- प्रो. जमन

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चंडीगढ़। कम ही स्टूडेंट होते हैं जो अध्यापकों की विरासत को संभाल कर रखते हैं, क्योंकि जमाना काफी बदल गया है। यह कहना है प्रसिद्ध उर्दू निबंधकार प्रोफेसर मोहम्मद जमन अजूरदाह का। वे वीरवार को पंजाब यूनिवर्सिटी के गोल्डन जुबली हॉल में उर्दू नावलिस्ट पद्मश्री जनाब कश्मीरी लाल जाकिर की 100वीं जयंती पर आयोजित सेमिनार में बोल रहे थे। मशहूर नावलिस्ट निरूपमा दत्त ने प्रोफेसर मोहम्मद जमन अजूरदाह से कई सवाल किए, जिनका उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया। प्रो. अजूरदाह ने पद्मश्री कश्मीरी लाल जाकिर के साथ बिताईं कई यादों को भी साझा किया।
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उर्दू विभाग के प्रोफेसरों के सहयोग से इस सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसका मकसद पद्मश्री जनाब कश्मीरी लाल जाकिर की 100वीं जयंती के अवसर पर उर्दू साहित्य के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। सेमिनार का उद्घाटन सत्र मुशायरों के नाजिम शम्स तबरेजी के साथ शुरू हुआ, जिन्होंने इस एक दिवसीय सेमिनार के महत्व और उद्देश्य पर प्रकाश डाला। प्रो. कमलेश मोहन ने जनाब कश्मीरी लाल जाकिर के जीवन और उपलब्धियों का परिचय देते हुए सेमिनार की शुरुआत की। इसके बाद पीयू के रजिस्ट्रार प्रो. करमजीत सिंह ने दर्शकों को संबोधित किया।
दूसरे सत्र में विनोद सहगल और महेंद्र प्रताप सिंह ने एक संगीतमय प्रस्तुति दी और दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दूसरे सत्र में उर्दू अदब की कुछ जानी-मानी हस्तियों ने अपनी बात रखी, जिनमें तसनीमा और डा. चंदर त्रिखा महत्वपूर्ण रहे। सेमिनार का समापन एल्युमनी डीन प्रो. दीप्ति गुप्ता द्वारा दिए गए धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।
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