10 वर्षीय नाबालिग की गर्भावस्था की जांच करेगी पीजीआई के डॉक्टरों की टीम
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली/चंडीगढ़।
सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ पीजीआई अस्पताल के डॉक्टरों की टीम को 10 वर्षीय दुराचार पीड़िता की गर्भावस्था की जांच करने का आदेश दिया है। वकील अलख आलोक श्रीवास्तव ने जनहित याचिका दायर कर नाबालिग के पेट में पल रहे 26 हफ्ते के गर्भ को गिराने की इजाजत मांगी है। पीठ ने इस संबंध में केंद्र सरकार सहित अन्य को भी नोटिस जारी किया है।
चीफ जस्टिस जेएस खेहर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने बुधवार को पीड़िता की गर्भावस्था की जांच करने का आदेश दिया है। पीठ ने विधिक सेवा प्राधिकरण, चंडीगढ़ के सदस्य सचिव को अमाइकस क्यूरी बनाते हुए मेडिकल जांच सुनिश्चित करने को कहा है। मेडिकल टीम जांच करेगी कि अगर इस बच्चे को जन्म दिया जाता है तो इससे 10 वर्षीय नाबालिग और नवजात शिशु के स्वास्थ्य पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। पीठ ने सदस्य सचिव को शुक्रवार को सीलबंद लिफाफे में मेडिकल रिपोर्ट जमा करने को कहा है। साथ ही पीठ ने नाबालिग पीड़िता और कम से कम एक अभिभावक को बुधवार को पीजीआई लाने ले जाने की व्यवस्था करने को कहा है।
याचिका में गुहार की गई थी कि स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय और कानून मंत्रालय को एम्स के डॉक्टरों का पैनल गठित करने का निर्देश दिया जाए, जिससे कि 26 हफ्ते के गर्भ को सुरक्षित तरीके से गिराया जा सके। इससे पहले जिला अदालत ने गत 18 जुलाई को गर्भपात की इजाजत देने से इनकार कर दिया था।
हर जिले में बने स्थायी मेडिकल बोर्ड
याचिका में यह भी गुहार की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को इस तरह के मामलों के लिए उचित दिशा-निर्देश जारी करे। नाबालिग दुराचार पीड़िता समेत अपवाद मामलों में सुरक्षित गर्भपात के लिए देश के हर जिले में स्थायी मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि चिकित्सा विशेषज्ञों ने साफ तौर पर राय दी है कि अगर 10 वर्षीय दुराचार पीड़िता को बच्चे को जन्म देने के लिए बाध्य किया जाता है तो यह पीड़िता और बच्चे, दोनों के लिए घातक हो सकता है।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 में संशोधन की अपील
याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971 की धारा-तीन में संशोधन करने का निर्देश दिया जाए। मौजूदा प्रावधान के मुताबिक, गर्भधारण के 20 हफ्ते के बाद गर्भपात की इजाजत नहीं दी जा सकती। लेकिन, अधिनियम की धारा-पांच में यह प्रावधान है कि अगर गर्भ के कारण महिला की जान को खतरा हो तो 20 हफ्ते के बाद महिला को गर्भपात कराने की इजाजत दी जा सकती है।
ये है मामला
कुछ दिनों पहले 10 साल की बच्ची के पेट में दर्द होने पर परिजन उसे अस्पताल ले गए। वहां जांच के बाद पता चला कि बच्ची 6 महीने की गर्भवती है। इसके बाद परिजनों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। बच्ची ने बताया कि उसके मामा कुल बहादूर ने ही उससे कई बार गलत काम किया है। पुलिस ने बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट और मां की शिकायत के आधार पर आरोपी मामा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।