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राज्य स्कूल शिक्षा बोर्ड ने करोड़ों रुपये की अप्रयुक्त किताबें रद्दी में बेची

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बिना सोचे समझे छापी गईं करोड़ों की नई किताबें रद्दी में बेची
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विभिन्न विषयों के 53 नई पाठ्यक्रम बदलने पर हुईं बेकार
10 बड़े ट्रकों में रद्दी डेराबस्सी पेपर मिल में भेजी
विनायक ट्रेडिंग कंपनी ने साढ़े 15 रुपये प्रति किलो ई-टेंडर जरिये खरीदी रद्दी
दविंदर पाल सिंह
मोगा। पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की ओर से 2018 -19 सेशन के लिए विभिन्न विषयों की 53 नई पाठ्यपुस्तकें बदलने के बाद जिला स्तरीय बोर्ड दफ्तरों में पड़ीं करोड़ों रुपये की नई किताबें रद्दी बन गई हैं। जिला स्तरीय दफ्तर से करीब 10 बड़े ट्रकों में रद्दी डेराबस्सी पेपर मिल में भेजी गई हैं।
यहां जिला स्तरीय स्कूल शिक्षा बोर्ड दफ्तर इंचार्ज बलजिंदर सिंह ने कहा कि विभाग की ओर से किताबों का सिलेबस बदलने के कारण ये किताबें बोर्ड ने ई-टेंडर से रद्दी में बेची हैं। विभागीय सूत्रों अनुसार राज्य में बोर्ड के जिला स्तरीय दफ्तरों में पड़ी करोड़ों की नई किताबों की रद्दी विनायक ट्रेडिंग नाम की कंपनी ने साढ़े 15 रुपये प्रति किलो ई-टेंडर से खरीदी। करोड़ों की ये किताबें बोर्ड ने सरकारी स्कूलों में छात्रों को मुफ्त बांटने के लिए खरीदीं थीं। सरकारी स्कूलों में पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों को 21 विषयों की किताबें पढ़ाई जातीं हैं।
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हर साल 100 करोड़ कमाते हैं निजी प्रकाशक
पंजाब में निजी प्रकाशकों का कारोबार हर साल तकरीबन 100 करोड़ का होता है। विभाग की ओर से ‘पढ़ो पंजाब-पढ़ाओ पंजाब’ मुहिम तहत पहले प्राइमरी कक्षाओं में निजी प्रकाशकों की किताबों पर पूर्ण पाबंदी लगा दी गई थी, पर सरकार की पाबंदी के बावजूद पंजाब में जितने भी निजी स्कूल हैं वह विद्यार्थियों को ज्यादा तैर निजी प्रकाशकों की किताबों से ही पढ़ाते हैं। इस से बोर्ड को हर साल करोड़ों का घाटा पड़ रहा ओर स्कूल बोर्ड की ओर से छपाई किताबें रद्दी बन रही हैं।
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निजी प्रकाशकों को लाभ पहुंचाने के लिए जान बूझकर लेट होती है छपाई
जिला शिक्षा अफसर (सीनियर सेकेंडरी) गुरदर्शन सिंह बराड़ ने बताया कि मोगा में 359 सरकारी प्राइमरी स्कूल हैं, जिनमें 36 हजार 522 विद्यार्थी पढ़ते हैं। इस तरह जिले में मिडिल, हाई और सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या 247 है। इन स्कूलों में 54 हजार 754 विद्यार्थी हैं। सरकारी स्कूलों में ज्यादातर गरीब परिवारों से संबंधित बच्चे ही हैं और बोर्ड कथित तौर पर निजी प्रकाशकों को लाभ पहुंचाने के लिए पुस्तकों की छपाई में हर सेशन के दौरान लेट लतीफी करता है। यही लेट लतीफी है कि ये पुस्तकें आज रद्दी का ढेर बन गई हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे अध्यापकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि चालू सेशन की किताबें अप्रैल तक बच्चों को मिलनी थीं। लेकिन अफसोस है ये किताबें कई महीने बाद स्कूलों में पहुंचीं हैं। विद्यार्थियों को समय के साथ किताबें बदलना प्रयास तो बढ़िया है लेकिन रद्दी हुई करोड़ों रुपये की किताबों की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया।

फोटो कैप्शन - मोगा में जिला स्तरीय स्कूल शिक्षा बोर्ड दफ्तर में नई किताबें ट्रकों में लोड करते लोग।
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