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प्रसिद्ध नाटककार प्रो. अजमेर सिंह औलख का निधन

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प्रसिद्ध नाटककार प्रो. अजमेर सिंह औलख का निधन
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मानसा में शुक्रवार को होगा अंतिम संस्कार, नहीं होगी कोई धार्मिक रस्म
लंबे समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे, कुछ दिन पहले ही मोहाली से इलाज करवाकर लौटे थे
अमर उजाला ब्यूरो
मानसा
पंजाबी के प्रसिद्ध नाटककार प्रो. अजमेर सिंह औलख का वीरवार सुबह निधन हो गया। वह पिछले लंबे समय से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे और कुछ दिन पहले ही अपना इलाज करवाकर मोहाली से आए थे। उनके इलाज का सारा खर्च पंजाब सरकार ने उठाया था। प्रो. औलख का अंतिम संस्कार शुक्रवार सुबह 10 बजे मानसा के राम बाग में किया जाएगा। उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक परिवार द्वारा श्रद्धांजलि समागम करवाया जाएगा और वहां कोई धार्मिक रस्म अदा नहीं की जाएगी।
19 अगस्त 1942 को गरीब किसान परिवार में जन्मे अजमेर सिंह औलख गांव किशनगढ़ फरमाही, भीखी और पटियाला में पढ़ाई करने के बाद मानसा के नेहरू कॉलेज में प्रोफेसर बने। इस दौरान उन्होंने नाटक ‘अरबद नरबद धंधुकारा’ लिखा। बाद में ‘बेगाने बोहड़ की छा’, ‘सत बिगाने’, चना दे पानी’, ‘गाकोमिका’, ‘इश्क जिन्हा दे हड्डी रचिया’, ‘सुखी कुख’ और ‘केहर सिंह की मौत’ आदि नाटक लिखे और प्रसिद्धि हासिल की।
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उन्हें पंजाब सरकार की तरफ से ‘शिरोमणि पंजाबी नाटककार सम्मान’, ‘भारतीय संगीत नाटक अकादमी अवार्ड’, ‘भारतीय साहित्य अकादमी अवार्ड’, ‘पंजाबी साहित्य रत्न अवार्ड’ दिया गया था। गुरु नानक यूनिवर्सिटी अमृतसर द्वारा उन्हें पीएचडी की डिग्री दी गई। गुरशरण सिंह लोक कला सलाम काफिला द्वारा 8 मार्च 2015 को बरनाला में हुई किसान रैली में प्रो. औलख को ‘भाई लालो कला’ सम्मान दिया गया। उनके नाटक पंजाबी और यूनिवर्सिटी के सिलेबस में भी शामिल किए गए हैं। वह केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा के अध्यक्ष रहने के अलावा इस समय जम्हूरी अधिकार सभा पंजाब के अध्यक्ष और ग्रीन हंट विरोधी आपरेशन के नेता भी रहे। औलख के परिवार में उनकी पत्नी और तीन विवाहित बेटियां हैं। उनका पूरा परिवार नाटक कला को समर्पित है। उन्होंने पंजाब और अन्य राज्यों के अलावा कनाडा में भी अपनी नाटक कला का लोहा मनवाया।


औलख का निधन मेरा निजी नुकसान
डॉ. सुरजीत पातर
नाटककार प्रो. अजमेर सिंह औलख ने पंजाबी नाटक को विश्व पटल पर पहुंचाने में अपना पूरा जीवन लगा दिया। उन्होंने नाटक लिखे ही नहीं, बल्कि उनका मंचन करके सामाजिक ताने बाने की समस्याओं, बारीकियों को आम जन तक पहुंचाने का भी प्रयास किया। इस काम में उनके परिवार और मित्रों ने भी पूरा योगदान किया। मेरा प्यारा, मासूम सा दोस्त अब हमारे बीच नहीं है। यह साहित्य जगत का ही नहीं, मेरा निजी नुकसान है। इसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता। प्रो. औलख के साथ मेरा सफर 37 साल का रहा। पंजाबी आर्ट काउंसिल चंडीगढ़ की ओर से वर्ष 1980 में आयोजित कार्यक्रम में मुझे और औलख को इकट्ठे ही बेस्ट बुक अवार्ड मिला था। उस वक्त मेरी उनके साथ पहली बार मुलाकात हुई थी। प्रो. औलख मानसा में कवि दरबार कराते थे। 1984 में उनके कॉलेज में फिर उनसे मुलाकात का अवसर मिला। कवि दरबार में शामिल हुआ, इसके बाद मुलाकातों का सिलसिला चल निकला। उनसे मेरी अंतिम मुलाकात दो माह पहले ही मानसा में हुई थी। वहां पर एक कार्यक्रम के लिए जाना हुआ। औलख बीमार थे, मैं हाल चाल जानने उनके घर पहुंच गया। काफी बातें हुईं, तब यह नहीं पता था कि यह अंतिम मुलाकात है।
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प्रो. औलख का नाटक बेगाने बोहड़ दी छां काफी प्रख्यात हुआ और इसी नाटक से उनको पंजाबी साहित्य जगत में ख्याति मिली। नाटक के जरिए उन्होंने गरीब, किसान और ग्रामीण इलाकों पर फोकस किया। भाषा पर औलख की जबरदस्त पकड़ थी। पंजाबी साहित्य में नानक सिंह, गुरबख्श सिंह इत्यादि के चलते माझे की भाषा का काफी जोर रहा। लेकिन मलवई भाषा को प्रोत्साहित करने और साहित्य जगत में जगह दिलाने में प्रो. औलख और गुरदियाल सिंह का अहम योगदान है। प्रो. औलख ने नाटक लिखे ही नहीं बल्कि वे गांव गांव जाकर नाटक खेलते भी थे और लोगों को संदेश देते थे। साहित्यिक तौर पर मानसा को अग्रणी बनाने में प्रो. औलख का अहम योगदान रहा। उनकी प्रेरणा से मानसा इलाके से कई नए कवि निकले। जब भी औलख से मुलाकात होती वह हमेशा नाटक को प्रमोट करने की ही बात करते। नाटक के अलावा उन्हें कुछ सूझता नहीं था। उनके निधन ने साहित्य जगत की फिजा को सूना कर दिया है।
(जैसा उन्होंने राजीव शर्मा को बताया)


फोटो : 15 एमएनएस 1 जेपीजी
कैप्शन : प्रो. अजमेर सिंह औलख
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