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पीजीआई के नॉन फेकल्टी सदस्यों को 28 साल बाद मिला न्याय

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पीजीआई के नॉन फेकल्टी सदस्यों को 28 साल बाद मिला न्याय
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पीजीआई की स्पेशल लीव पटीशन खारिज, समयबद्ध प्रमोशन की थी बड़ी मांग
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पीजीआई के नॉन फेकल्टी मेंबरों को आखिरकार 28 साल बाद न्याय मिल गया है। वे अपनी लड़ाई साल 1990 से लड़ रहे थे। उनकी प्रमुख मांग थी कि जिस तरह से फेकल्टी के प्रमोशन समयबद्ध किए जाते हैं, उसी तर्ज पर नॉन फेकल्टी मेंबरों के किए जाएं और उन्हें पेशेंट केयर अलाउंस भी दिया जाए। इसके लिए कई कमेटी गठित की गई, लेकिन पीजीआई ने कमेटी की मांग स्वीकार नहीं की। उसके बाद पीजीआई मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट एसोसिएशन ने कैट में एक याचिका दाखिल की। साल 2013 में उनके हक में कैट ने फैसला दे दिया। उस दौरान कुल 29 मांगें थीं, जिनमें से 27 मांगों को लागू करने को कहा था। उसके फैसले के खिलाफ पीजीआई ने हाईकोर्ट में अपील की। 31 मार्च साल 2014 में हाईकोर्ट ने पीजीआई की अपील खारिज कर दी। उसके बाद पीजीआई की ओर से स्पेशल लीव पटीशन (एसएलपी) दायर की गई। शुक्रवार को चौथी एसएलपी को भी सुप्रीमकोर्ट ने खारिज कर दी। इससे नॉन फेकल्टी मेंबरों को उम्मीद बनी है कि पीजीआई अब उनकी मांगों को स्वीकार कर लेगा। पीजीआई मेडिकल टेक्नोलाजिस्ट एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी अश्विनी कुमार मुंजाल ने बताया कि वे पिछले ढाई दशक से अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। कई कर्मचारी बिना प्रमोशन के रिटायर हो गए। इस दौरान कई कर्मचारी अपने हक के लिए जेल भी गए। अब इतने दिनों नॉन फेकल्टी मेंबरों को न्याय मिला है तो पीजीआई को उनकी मांगें मान लेनी चाहिएं। नॉन फेकल्टी मेंबरों पर भी लगातार काम का दबाव बढ़ता जा रहा है, लेकिन उनकी प्रमोशन नहीं की जा रही। इससे कर्मचारियों में लगातार मायूसी भी है। उनके मुताबिक फेकल्टी मेंबरों की हर मांग तुरंत मान ली जाती है, लेकिन जब बात नॉन फेकल्टी मेंबरों की आती है तो उस मामले में कोर्ट चले जाते हैं।
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