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जिन लाहौर न देख्या ओ जम्माइ नइ

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‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई’ का सफल मंचन

अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। खाक उड़ाते हैं दिन रात, मीलों फैल गए सइरा
प्यासी धरती जलती है, सूख गए बहते दरिया।
इन पंक्तियों के साथ मशहूर नाटक ‘जिन लाहौर नहीं वेख्या ओ जनम्याई नई’ का एक बार फिर सफल मंचन हुआ। मशहूर नाटककार असगर वजाहत के लिखे इस नाटक का निर्देशन वीना धीर और सुदेश शर्मा ने किया। नाटक को उत्तराखंड के संस्था युग मंच के कलाकाराें ने प्रस्तुत किया। बाल भवन सेक्टर-23 में 30 दिवसीय विंटर नेशनल थिएटर फेस्टिवल के तहत नाटक प्रस्तुत किया गया।
नाटक में कलाकारों ने आपसी प्रेम और भाईचारे की संदेश दिया। विभाजन के बाद एक परिवार लखनऊ से लाहौर जाता है। शरणार्थी शिविर में रहने के बाद उन्हें लाहौर में रतन लाल जौहरी की 22 कमरों की हवेली मिलती है। रतन की मौत हो गई और उनकी बूढ़ी मां घर में रह जाती है। अलीम की चाय की दुकान नाटक का प्रमुख केंद्र रही। शायर नासिर यहीं पर चाय की चुसकी लेते हुए कट्टरपंथी पहलवान याकूब को नसीहत देता है। शायर कहता है कि हैवान हैवान होता है, वह किसी का नहीं होता। याकूब इस हवेली पर कब्जा जमाना चाहता है। वह अपने चमचों के साथ हवेली आ धमकता है और बूढ़ी मां को ठिकाने लगाने की योजना बनाता है। उसने मौलवी के यहां शरण ली है। लेकिन मौलवी के इंसानियत के आगे उसकी नहीं चलती है।
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एक दिन अचानक अम्मा के सीने में दर्द उठने से अम्मा चल बसती है। मरने के बाद सवाल उठता है कि क्रिया कर्म कैसे किया जाए। स्थानीय मौलवी की राय पर उसका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया जाता है। उसके शव को राम नाम सत्त कहते हुए ले जाते हैं और रावी के किनारे जला देते हैं। पहलवान को इसका पता चलता है तो वह मौलवी का कत्ल कर देता है। कट्टरपंथी इस सोच के साथ ही नाटक खत्म हो गया। नाटक में मुख्य भूमिका जितेंद्र, खुशी सहदेव, मोनिका आर्य, वैभव जोशी सहित अन्य कलाकारों ने निभाई। नाटक के ब्रेक स्टेज पर मनोज कुमार, भास्कर, दीपक सहदेव, सुनील कुमार और डीके शर्मा थे।
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