प्रशासन की चौखट से निकल रही साहित्य की धारा
सबहेड
ट्राइसिटी में कई ऐसे प्रशासनिक अधिकारी हैं, जो वर्षों से साहित्य के क्षेत्र में हैं सक्रिय
अरविंद बाजपेयी
चंडीगढ़। कहते हैं कि सकारात्मक विचार से ही एक स्वस्थ समाज तैयार होता है। यह समाज को सकारात्मक विचार देने में साहित्यकारों की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण है। और अगर ऐसे साहित्यकार अगर प्रशासनिक अधिकारी की भूमिका में भी हों तो बात सोने पर सुहागा वाली हो जाती है। ट्राइसिटी में कई ऐसी शख्सियत हैं, जो साहित्य की सेवा के साथ अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी को भी बखूबी निभा रही हैं। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद प्रशासन के यह अफसर न केवल साहित्यिक गतिविधियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं बल्कि अपनी दमदार उपस्थिति भी दर्ज कराते हैं। आइए आपको आज हम कुछ ऐसे ही प्रशासनिक अफसरों से रूबरू कराते हैं, जिनकी पकड़ प्रशासनिक कार्यों के साथ साहित्य और अदब की दुनिया में भी बराबर है।
प्रशासनिक फाइलों में ही मिल जाती हैं तमाम रचनाएं
मेरी साहित्यिक रचनाएं कालेज के दौर से ही शुरू हो गई थीं। शुरुआती दौर में मैंने एजूकेशन की किताबें लिखीं। इसके बाद मेरी किताब ‘वायरल मैच’ वर्ष 2008 में प्रकाशित हुई। यह एक फिक्शन स्टोरी है, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। प्रशासनिक जिम्मेदारी के साथ साहित्य से जुड़े रहना मन को काफी सुकून देता है। साहित्य का सृजन वास्तव में माहौल से होता है। खासतौर से प्रशासनिक पदों पर रहने वालों के लिए यह एक अच्छी बात है कि उनको उनके पात्र और रचनाएं अपनी फाइलों में ही मिल जाती हैं। वास्तविकता यह है कि साहित्य के सृजन के लिए वेदना और संवेदना दोनों आवश्यक होती है। मेरी रचनाओं में भी आपको यह मिलेगा। प्रशासनिक पद हो या फिर एक आम आदमी, यदि साहित्य के साथ उसका नाता है तो वह अपनी बातों को साहित्य के माध्यम से कह सकता है। इस अभिव्यक्ति से वह काफी रिलैक्स महसूस करता है। साथ ही साहित्य के साथ नाता रखने वालों को लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं का हमेशा ख्याल रहता है।
- राजेश खुल्लर, मुख्य मंत्री हरियाणा के प्रधान सचिव
बिना लिखे मन नहीं मानता
कालेज के दिनों में मैं लिट्रेचर की स्टूडेंट थी। मैंने वर्ष 1990 में छोटी-छोटी कविताएं लिखनी शुरू की। फिर मेरा परिचय हुआ ‘संगम कुरुक्षेत्र’ से, जिससे मुझको एक नई दिशा मिली। बीडी कालिया हमदम ने मुझे अदबी संगम में इंट्रोड्यूस किया था। वर्ष 1997 में मैंने अपनी पहली पुस्तक ‘अमलताश’ लिखी। यह किताब काफी सराही गई। मैंने अब तक सात किताबें लिखी हैं। इनमें से ज्यादातर हिंदी में हैं। अमलताश के बाद मेरी किताबें सफर लफ्जों का-मैं से तुम तक, शिवा मन नारी मन, शरणागत मेरे साहिब प्रकाशित हुईं। मां के निधन के बाद मैंने ‘ठंडी छां’ किताब लिखी। उसके बाद ‘धरा उवाच इद्धनमाम’ लिखी। साहित्य का सृजन कहीं भी किया जा सकता है। मैं दो वर्ष के लिए अमेरिका में रही और वहीं मैने मैं शरणागत मेरे साहिब किताब लिखी। वास्तव में हिंदी में जो कशिश है शायद ही किसी अन्य भाषा में आ सके। साहित्य की रचना तो मन से होती है और मन समय नहीं देखता है, यही कारण रहा जब मैने सर्विसेज में ज्वाइन किया तो उस समय भी रात को घर आती थी तो बिना कुछ लिखे अच्छा नहीं लगता था। वास्तव में साहित्य की रचना एक ध्यान की प्रक्रिया भी होती है।
-डा. सुमेधा कटारिया, डीसी पानीपत
साहित्य का सृजन करने वाला हमेशा मृदुभाषी रहता है
मेरी साहित्यिक यात्रा 1981-82 से शुरू हुई। उस वक्त मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में शिक्षा हासिल कर रहा था। पहली किताब मैंने वर्ष 1996-97 में लिखी, जिसका नाम था ‘बाबा रामेश्वर दास की जीवनी’। उसके बाद पंजाब पुलिस रूल लिखे। लिखने का शौक तो बचपन से ही था। बस जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे उसका रूप बदलता गया। मैंने कई आर्टिकल लिखे, जो महिला, समाज, पर्यावरण और क्राइम जैसे विषयों पर केंद्रित रहे। प्रशासनिक पद आपको जिम्मेदारियों से रूबरू करवाता है। जिम्मेदारियां भी कई प्रकार की हैं, जिसमें सामाजिक, प्रशासनिक और देश के प्रति जिम्मेदारी अहम है। एक बात मैंने महसूस की है कि साहित्य का सृजन करने वाले हमेशा मृदुभाषी और दूसरों को ज्यादा समझने वाले होते हैं।
-आरसी मिश्रा, एडीशनल आईजी, अंबाला रेंज
मैंने जो कुछ देखा, उसे लिखकर समाज के सामने ले आया
मैंने कालेज के समय से साहित्य का सृजन शुरू किया। कालेज में कविताएं, रचनाएं लिखता था। जब नौकरी की बारी आई तो मैंने एक समाचार पत्र में काम करना शुरू किया। फिर पुलिस सर्विसेज में आ गया। मैंने अब तक 20 किताबें लिखी हैं। इसमें से आठ कविताओं की किताबें हैं। इसमें से चार हिंदी में हैं, तीन अंग्रेजी में हैं और एक उर्दू में हैं। मेरे कई लेख अलग-अलग जगह प्रकाशित हुए। यह लेख सामाजिक मुद्दों पर रहे। ऐसे ही लिखने-पढ़ने का क्रेज बढ़ता ही चला गया। वास्तव में साहित्य का सृजन करने वाले प्रशासनिक अधिकारी की एक खूबी होती है कि वह उस अंधेरे पक्ष को जानता है जो दुनिया नहीं जानती। ऐसे में उसके साहित्य में एक खास बात होती है। मैंने तो जो कुछ देखा उसको लिखा। उससे मन में कोई बोझ नहीं रह जाता है। हम लोग उसको समाज के सामने ले आते हैं।
-राजबीर देसवाल, पूर्व आईपीएस अधिकारी
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आईएएस दंपती भी कर रहे साहित्य की सेवा
हरियाणा के आईएएस दंपती भी साहित्य के सृजन में जुटे हैं। एडीशनल चीफ सेकेट्री हरियाणा डा. धीरा खंडेलवाल और रेरा के चेयरमैन डा. केके खंडेलवाल ने साहित्य को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई है। डा. धीरा खंडेलवाल के सात कविता संकलन आ चुके हैं। उनकी किताबों को वाणी प्रकाशन ने पब्लिश किया है। डा. धीरा खंडेलवाल की किताबों की भूमिका स्वर्गीय गीतकार गोपालदास नीरज ने भी लिखी है। वहीं, डा. केके खंडेलवाल की अब तक नौ किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने हरियाणा की कला और साहित्य को न सिर्फ बढ़ावा देने में अपना अहम योगदान किया बल्कि उसको एक नई दिशा भी दी है। डा. केके खंडेलवाल ने दस विषयों में एमए किया है।