मातृभाषा का गौरव बहाल करने के लिए आंदोलन खड़ा करना होगा: सिद्धू
- चंडीगढ़ में पंजाबी हितैषियों द्वारा लगाई गई पंचायत
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाबी हमारी पहचान और जमीर है और यदि इसको खो बैठेंगे तो हमारा अस्तित्व ही नहीं रहेगा। इसलिए मातृभाषा का रुतबा बहाल करने के लिए आंदोलन खड़ा करना पड़ेगा और चंडीगढ़ की इस लड़ाई में हर पंजाबी को कूदना पड़ेगा। यह बात पंजाब के सांस्कृतिक और पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने कही। उन्होंने चंडीगढ़ में पंजाबी मातृभाषा का छीन हुआ गौरव हासिल करने के लिए लोक लहर खड़ी करने का न्योता दिया।
सिद्धू सेक्टर-16 पंजाब स्थित कला भवन में चंडीगढ़ पंजाबी मंच द्वारा पंजाब कला परिषद के नेतृत्व में चंडीगढ़ प्रशासन में पंजाबी को सरकारी भाषा का रुतबा दिलाने के लिए बुलाई गई पंजाबी हितैषियों की पंचायत के दौरान उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष हमें इकट्ठे मिलकर लड़ना पड़ेगा और लोगों के गुस्से के आगे कोई भी सरकार या प्रशासन हो, उसे झुकना ही पड़ता है। उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी है और यहां पंजाबी मातृभाषा के साथ भेदभाव किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह खुद इस संघर्ष में उनके साथ खड़े हैं।
पंजाबी में कार्टून बनाए जाएं
सिद्धू ने दुनिया के कई देशों की उदाहरण देते हुए बताया कि कोई भी देश कितनी भी तरक्की कर ले परंतु वहां के निवासियों ने मातृभाषा को कभी भी अनदेखा नहीं किया। उन्होंने कहा कि हमारी आने वाली पीढ़ी कार्टूनों के प्रभाव से पंजाबी मातृभाषा से किनारा कर रही है, जिसके लिए हमें जरूरत है कि पंजाबी में कार्टून बनाए जाएं।
टूरिज्म सर्किट बनेगा : सिद्धू कहा कि उनके विभाग द्वारा पंजाबी के नामवर लेखकों जैसे भाई वीर सिंह, धनी राम चात्रिक, नानक सिंह, गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी, शिव कुमार बटालवी, अमृता प्रीतम, बलवंत गार्गी आदि के पैतृक घरों को जोड़ता हुआ सर्किट बनाया जाएगा और बाहर से आने वाले पंजाबियों को इन स्थानों को दिखाने के लिए प्रयास किया जाएगा, जिससे आने वाली पीढ़ी बड़े लेखकों के जीवन से कोई सीख ले सके।
उन्होंने कहा कि यदि इंग्लैंड में विलियम शेक्सपियर का घर पर्यटनों के लिए आकर्षण का केंद्र हो सकता है तो हमारे किसी पंजाबी लेखक का घर क्यों नहीं। उन्होंने यह भी घोषणा किया कि स्थानीय निकाय विभाग द्वारा सभी शहरों के साइन बोर्डों पर पंजाबी भाषा को प्राथमिकता देने के आदेश किये जाएंगे और पत्र व्यवहार सिर्र्फ पंजाबी में लाजिमी किया जाएगा।
पंजाब कला परिषद के चेयरमैन पद्मश्री डॉ. सुरजीत पातर ने कहा कि वह किसी भी दूसरी भाषा का विरोध नहीं करते बल्कि सब भाषाओं का सत्कार करते हैं, लेकिन मातृभाषा पंजाबी की कीमत पर किसी दूसरी भाषा को अपनाने का विरोध करते हैं। मातृभाषा की कीमत पर किसी अन्य भाषाओं को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने उदाहरण सहित बताया कि यदि पहला बच्चा पंजाबी पढ़े और फिर अंग्रेजी या अन्य भाषा सीखे तो वह बढ़िया भाषाएं सीख सकता है।
पंचायत में मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार सतनाम माणक ने कहा कि हमें भाषायी गुलामी की जंजीरों में बांधा गया जिसको तोड़ना समय की मुख्य मांग है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और प्रशासन की भाषा मातृभाषा ही होनी चाहिए। पंजाबी भाषा को रोजगार की भाषा बनाने के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक कामकाज सिर्फ पंजाबी भाषा में हो।
भाषा विशेषज्ञ डा.जोगा सिंह ने कहा कि भाषा विज्ञानी यह सिद्ध कर चुके हैं कि छोटा बच्चा सबसे अधिक आसानी से मातृभाषा को सीख सकता है। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि अंग्रेजी भाषा को सरकारी भाषा बना कर चंडीगढ़ प्रशासन स्थानीय लोगों के साथ भेदभाव कर रहा है। पत्रकार तरलोचन सिंह ने कहा कि कितने जुल्म वाली बात है कि देश के 29 राज्यों और चंडीगढ़ को छोड़ कर बाकी 6 केंद्र शासित प्रदेश में कही भी अंग्रेजी को सरकारी भाषा का दर्जा हासिल नहीं जबकि यह धक्का सिर्फ चंडीगढ़ के साथ किया है और इसी के खिलाफ यह पंचायत बुलाई है।
चंडीगढ़ पंजाबी मंच के देवी दयाल शर्मा ने कहा कि 13 लाख जनसंख्या वाले शहर चंडीगढ़ में अंग्रेजी भाषा धक्के से थोपी गई है जो कि असंवैधानिक है क्योंकि हमारे संविधान में दर्ज 22 भाषाओं में अंग्रेजी का नाम नहीं आता। केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा द्वारा डा.सरबजीत ने कहा कि पंजाबी भाषा का मुद्दा भावुक मुद्दा नहीं बल्कि हमारे अमीर सभ्याचार, पृष्ठभूमि और हमारी जड़ों का मामला है और हमें मिलकर लड़ना पड़ेगा।
चंडीगढ़ के गांव सारंगपुर के सरपंच साधु सिंह ने कहा कि हमारी आने वाली पीढ़ी मातृभाषा और मां बाप दोनों से ही दूर जा रही है। रघुबीर सिंह ने समूह गुरुद्वारा संगठन की तरफ से बोलते इस संघर्ष में पूर्ण समर्थन देने के भरोसा दिया। दीपक शर्मा चनारथ ने स्टेज का संचालन किया। पंजाबी लेखक सभा चंडीगढ़ की तरफ से बलकार सिद्धू ने धन्यवाद किया।
पंजाबी लेखक सभा चंडीगढ़ की देखरेख में पेंडू संघर्ष कमेटी, केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा, समूह गुरुद्वारा प्रबंधन संगठन और अन्य सहयोगी संस्थाओं के सांझे प्रयास से चंडीगढ़ पंजाबी मंच द्वारा बुलाई इस पंचायत में सांसद डा. धर्मवीर गांधी, श्रीराम अर्श, पंजाब साहित्य अकादमी की प्रधान सरबजीत कौर सोहल सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
पहली नवंबर को चंडीगढ़ पंजाबी मंच काला दिवस मनाएगा। चंडीगढ़ पंजाबी मंच के महासचिव देवी दयाल शर्मा और सचिव दीपक शर्मा चनारथल ने बताया कि पहली नवंबर को काला दिवस मनाएंगे। उसी दिन हमारी मातृभाषा छीन ली गई उसी के विरोध में काला दिवस मनाएंगे। काला दिवस किस प्रकार मनाएंगे इसके लिए मंच की कार्यकारिणी की बैठक में फैसला लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके लिए एक चार पन्नों का बुकलेट निकालेंगे जो चंडीगढ़ के घर घर में भेजा जाएगा। साथ ही सभी राजनीतिक पार्टियों को एक मंच पर बुलाया जाएगा और उनसे वर्ष 2019 के आम चुनाव में घोषणा पत्र में पंजाबी को पहली भाषा का दर्जा दिलाने के लिए जोड़ने को कहा जाएगा। डॉ. धर्मवीर गांधी ने इस मुद्दे को लोकसभा में उठाने का वादा किया।